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गरबा की तीन तालियों से त्रिदेव का कनेक्शन, डांडिया का भी खास महत्व…जानकर हो जाएंगे हैरान

नवरात्र में खेले जाने वाले गरबा नृत्य का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक गहरा है। गरबा के सेंटर में छिद्रदार मिट्टी के घड़े (गरबो) के भीतर जलता दी...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Akriti kumari
Publish Date: Thu, 15 Oct 2026 11:33:36 AM (IST)Updated Date: Thu, 15 Oct 2026 11:33:36 AM (IST)
गरबा की तीन तालियों से त्रिदेव का कनेक्शन, डांडिया का भी खास महत्व…जानकर हो जाएंगे हैरान
गरबा के सेंटर में रखे दीपक वाले घड़े (गरबो) का रहस्य

HighLights

  1. गरबा के सेंटर में रखे दीपक वाले घड़े (गरबो) का रहस्य
  2. 3 तालियों का ब्रह्मा, विष्णु और महेश से गहरा संबंध
  3. यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल है गरबा

धर्म डेस्क। शारदीय नवरात्र (11 से 19 अक्टूबर 2026) के पावन दिनों में भक्ति, संगीत और ऊर्जा का अद्भुत संगम 'गरबा' (Garba) नृत्य के रूप में देखने को मिलता है। मूल रूप से गुजरात की इस सांस्कृतिक धरोहर को पूरे विश्व में पहचान मिल चुकी है।

दिसंबर 2023 में यूनेस्को (UNESCO) द्वारा गरबा को भारत की 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था। गोल घेरे में घूमकर किया जाने वाला यह नृत्य केवल मनोरंजन या लोक-नृत्य नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक, ब्रह्मांडीय और पौराणिक रहस्य छिपा हुआ है।


आइए समझते हैं गरबा नृत्य से जुड़े मुख्य धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक-

सेंटर में छेद वाला घड़ा और जलता दीपक

गरबा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के 'गर्भ' शब्द से हुई है, जिसका सीधा सम्बंध 'गर्भाशय' और 'सृजन' (Creation) से है। गरबा के सेंटर में छेद वाला मिट्टी का घड़ा स्थापित किया जाता है, जिसे 'गरबो' कहते हैं। यह मिट्टी का घड़ा मानव शरीर और स्त्री की सृजन शक्ति (गर्भ) को दर्शाता है।

घड़े के भीतर जलता हुआ दीपक 'गर्भ दीप' कहलाता है। यह दिव्य ज्योति जीवन की चेतना, मां दुर्गा की असीम शक्ति और आत्मा का प्रतीक है। जिस तरह शरीर मिट्टी के समान नश्वर है और उसके भीतर आत्मा रूपी दीपक जलता है, उसी प्रकार इस घड़े के चारों ओर घूमकर साधक जीवन का रहस्य समझता है।

गोल घेरे में नृत्य का आध्यात्मिक अर्थ

हिंदू धर्म दर्शन में गोल चक्र जीवन, मृत्यु और पुनः जन्म के अनंत चक्र का प्रतीक माना जाता है। गरबा के दौरान लोग गोल घेरे में मां दुर्गा की प्रतिमा या 'गर्भ दीप' के चारों ओर नृत्य करते हैं। इसका मतलब यह है कि संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान और परिवर्तनशील है, जबकि मां भगवती इस पूरे ब्रह्मांड का मुख्य सेंटर (Center of Energy) हैं। गरबा में कोई भी व्यक्ति किसी भी समय समूह में शामिल हो सकता है, जो समाज से ऊंच-नीच और भेदभाव मिटाकर सामूहिक एकता और भाईचारे का संदेश देता है।

तीन तालियों का 'त्रिदेव' और 'त्रिगुण' से सम्बंध

गरबा नृत्य के दौरान मुख्य रूप से 3 तालियां बजाने का विधान है, जो सनातन परंपरा के तीन प्रमुख सिद्धांतों को जागृत करती हैं-

त्रिदेव का आह्वान:

  • पहली ताली: भगवान ब्रह्मा (इच्छा शक्ति)
  • दूसरी ताली: भगवान विष्णु (कार्य शक्ति)
  • तीसरी ताली: भगवान शिव (ज्ञान शक्ति)

त्रिगुण संतुलन: ये तीन तालियां मां दुर्गा के तीन दिव्य रूपों– मां महाकाली, मां महालक्ष्मी और मां महासरस्वती को प्रसन्न कर साधक के भीतर के तीन गुणों (सत्व, रज और तम) में संतुलन स्थापित करती हैं।

डांडिया और अस्त्रों का संदेश

गरबा के साथ खेला जाने वाला 'डांडिया रास' भी गहरा धार्मिक संदेश देता है:

  • देवी के शस्त्रों का प्रतीक: डांडिया में उपयोग की जाने वाली रंग-बिरंगी लकड़ी की छड़ें (डंडे) मां दुर्गा के हाथों में सुशोभित तलवार और त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्रों का प्रतीक हैं।
  • अधर्म पर धर्म की विजय: यह नृत्य मां दुर्गा और महिषासुर के बीच हुए भयंकर संग्राम, अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना की खुशी को दर्शाता है।

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