
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। श्रावण मास के पवित्र अवसर पर श्यामला हिल्स स्थित राज्य संग्रहालय में भारतीय कला, संस्कृति और धर्म का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।
संग्रहालय में भगवान शिव और उनके परिवार की लगभग 25 अत्यंत दुर्लभ एवं प्राचीन प्रतिमाएं प्रदर्शित की गई हैं, जो श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
ये ऐतिहासिक प्रतिमाएं पांचवीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक की हैं, जिन्हें मध्य प्रदेश के विभिन्न अंचलों- सतना, मंदसौर, मुरैना, इंद्रगढ़, जबलपुर और छतरपुर से लाकर यहां संरक्षित किया गया है।
ये कलाकृतियां किसी समय प्रदेश के ऐतिहासिक मंदिरों के गर्भ गृह और मूल स्थापत्य का गौरव हुआ करती थीं।संग्रहालय में प्रदर्शित मूर्तियों में भगवान शिव के सौम्य (अघोर) से लेकर संहारक (घोर) तक, एकादश रुद्रों के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन होते हैं।
पुरातत्व विशेषज्ञ एवं राज्य संग्रहालय के सलाहकार बीके लोखंडे ने बताया कि भारतीय धर्म और दर्शन जनमानस के अंतर्मन में समाया हुआ है। भारत की प्राचीनतम सांस्कृतिक परंपराओं में धर्म तथा संस्कृति से जुड़े विचार ही मूर्ति निर्माण के मुख्य आधार रहे हैं।
उन्होंने बताया कि सिंधु घाटी सभ्यता की मृण्मूर्तियों (मिट्टी की कलाकृतियों) से शुरू हुई यह परंपरा कालांतर में पत्थरों की स्थायी मंदिर शिल्प-कला के रूप में विकसित हुई।
पुराणों के अनुसार, चतुर्मास के दौरान जब सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु योगनिद्रा (शयनकाल) में रहते हैं, तब भगवान शिव ही सृष्टि के संचालन और पालनहार का दायित्व संभालते हैं।
यही कारण है कि सावन में शिव स्तुति का विशेष धार्मिक महत्व है।पौराणिक ग्रंथों और कथानकों को जीवंत करती ये प्रतिमाएं भारतीय कला और इतिहास की समृद्ध विरासत का साक्षात प्रमाण हैं। प्राचीन भारतीय शिल्प और शिव भक्ति के इस अद्भुत संगम को देखने बड़ी संख्या में पर्यटक राज्य संग्रहालय पहुंच रहे हैं।
कल्याण सुंदर दृश्य: शिव-पार्वती विवाह का मनमोहक और मांगलिक अंकन।
संगीत व योग स्वरूप: सदाशिव मृदंगवादक, योगीश्वर और योगाचार्य रूप।
अनुग्रह व कल्याणकारी रूप: सदाशिव वरेश्वर, वैद्यनाथेश्वर तथा विवाह पूर्व नटेश स्वरूप।
संहारक रूप: भगवान शिव के उग्र व शक्तिशाली नटराज एवं भैरव स्वरूप।