Shani Dev: अप्रैल महीने में शनि का राशि परिवर्तन होने जा रहा है। शनि के गोचर से जहां कई राशिवालों की परेशानियां खत्म होंगी। वहीं कुछ राशि के जातकों के लिए मुश्किल समय शुरू होगा। शनि देव को कर्मफल दाता कहा गया है। इसलिए वह लोगों को उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। शनि महाराज उनके लिए खराब होते हैं, जो जीवन में बुरे काम करते हैं। अच्छे कर्म करने वाले मनुष्य के लिए शनि लाभदायक रहते हैं। अभी शनिदेव मकर राशि में हैं। अब ढ़ाई साल के लिए कुंभ राशि में गोचर करेंगे। शनि के राशि परिवर्तन से कई राशियों पर शुभ तो कई पर अशुभ प्रभाव पड़ेगा।
शनिदेव की दो दशाएं हैं। पहली साढ़े साती जो साढ़े सात वर्ष के लिए है। दूसरी ढ़ैया जो ढ़ाई साल के लिए है। अप्रैल के बाद जून माह में शनि वक्री चाल चलेंगे। शनि की वक्री चाल भी शुभ नहीं मानी जाती है। इस साल शनिदेव दो बार राशि परिवर्तन करेंगे। इससे धनु, मकर, कुंभ, मीन, मिथुन, कर्क, तुला और वृश्चिक राशि पर शनि अपना प्रभाव करेंगे। 29 अप्रैल 2022 को शनिदेव मकर राशि से निकलकर कुंभ राशि में प्रवेश करेंगे। तब मकर, कुंभ और मीन राशि पर साढ़ेसाती रहेगी।
शनिदेव को प्रसन्न करने के उपाय
श्री शनि चालीसा:
श्री शनिश्चर देवजी, सुनहु श्रवण मम् टेर। कोटि विघ्ननाशक प्रभो, करो न मम् हित बेर।।
तव स्तुति हे नाथ, जोरि जुगल कर करत हौं। करिए मोहि सनाथ, विघ्नहरन हे रवि सुवन।।
शनिदेव मैं सुमिरौं तोही। विद्या बुद्धि ज्ञान दो मोही।। तुम्हरो नाम अनेक बखानौं।। क्षुद्रबुद्धि मैं जो कुछ जानौं।। अन्तक, कोण, रौद्रय मगाऊं। कृष्ण बभ्रु शनि सबहिं सुनाऊं।। पिंगल मंदसौरि सुख दाता। हित अनहित सब जब के ज्ञाता। नित जपै जो नाम तुम्हारा। करहु व्याधि दुख से निस्तारा। राशि विषमवस असुरन सुर नर। पन्नग शेष सहित विद्याधर।। राजा रंक रहहिं जो नीको। पशु पखी वनचर सबही को।। कानन किला शिविर सेनाकर। नाश करत सब ग्राम्य नगर भर।। डालत विघ्न सबहि के सुख में। व्याकुल होहिं पड़े सब दुख में।। नाथ विनय तुमसे यह मेरी। करिये मोपर दया घनेरी।। मम हित विषम राशि महंवासा। करिये न नाथ यही मम आसा।। जो गुड़ उड़द दे वार शनीचर। तिल जव लोह अन्न धन बिस्तर।। दान दिये से होंय सुखारी। सोइ शनि सुन यह विनय हमारी।। नाथ दया तुम मोपर कीजै। कोटिक विघ्न क्षणिक महं छीजै।। वंदत नाथ जुगल कर जोरी। सुनहु दया कर विनती मोरी।। कबहुंक तीरथ राज प्रयागा। सरहू तोर सहित अनुरागा।।
कबहुं सरस्वती शुद्ध नार महं। या कहुं गिरी खोह कंदर महं।। ध्यान धरत हैं जो जोगी जनि। ताहि ध्यान महं सूक्ष्म होहि शनि।। है अगम्य क्या करूं बड़ाई। करत प्रणाम चरण शिर नाई।। जो विदेश से बार शनीचर। मुड़कर आवेगा जिन घर पर।। रहैं सुख शनि देव दुहाई। रक्षा रवि सुत रखैं बनाई।। जो विदेश जावैं शनिवारा। गृह आवैं नहिं सहै दुखारा।। संकट देय शनिचर ताही। जेते दुखी होई मन माही। सोई रवि नंदन कर जोरी। वंदन करत मूढ़ मति थोरी।। ब्रह्मा जगत बनावन हारा। विष्णु सबहिं नित देत अहारा।। हैं त्रिशूलधारी त्रिपुरारी। विभू देव मूरति एक वारी।। इकहोइ धारण करत शनि नित। वंदत सोई शनि को दमनचित।।
जो नर पाठ करै मन चित से। सो नर छुटै व्यथा अमित से।। हौं सुपुत्र घन संतति बाढ़े। कलि काल कर जोड़े ठाढ़े।। पशु कुटुंब बांधन आदि से। भरो भवन रहिहैं नित सबसे।। नाना भांति भोग सुख सारा। अंत समय तजकर संसारा।। पावै मुक्ति अमर पद भाई। जो नित शनि सम ध्यान लगाई।। पढ़ै प्रात जो नाम शनि दस। रहैं शनीश्चर नित उसके बस।। पीड़ा शनि की कबहुं न होई। नित उठ ध्यान धरै जो कोई।। जो यह पाठ करैं चालीसा। होय सुख साखी जगदीशा।। चालिसा दिन नित पढ़ै सबेरे। पातक नाशे शनि घनेरे।। रवि नंदन की अस प्रभुताई। जगत मोहतम नाशै भाई।। याको पाठ करै जो कोई। सुख संपत्ति की कमी न होई।। निशिदिन ध्यान धरै मनमाहीं। आधि-व्याधि ढिंग आवै नाहीं।।
पाठ शनीश्चप देव को, कीन्हो विमल तैयार। करत पाठ चालीसा दिन, हो भवसागर पार।।
जो स्तुति दशरथ जी कियो, सम्मुख शनि निहार। सरस सुभाषा में वही, ललिता लिखें सुधारा।।
डिसक्लेमर
'इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।'