
एक समय था जब हमारे देश को सपेरों का देश कहा जाता था। लोग भले ही यह कहते हों, लेकिन हमारे देश में हर जीव को देवतुल्य माना गया है। सांप भी उन्हीं में से एक है। सांप को हम नागदेवता कहते हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों में नाग देवता से जुड़ी कई कहानियां मिलती हैं।
इसलिए नागपंचमी के दिन नागों की पूजा अर्चना करते हैं। यह पर्व हमारी धार्मिक आस्था एवं विश्वास के साथ जुड़ा हुआ है। जीवों को देवतुल्य मानकर उनको पूजना हमारे संस्कृति में हिंसक प्राणियों के प्रति भी दयाभावना को प्रदर्शित करता है।
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हिंदू पुराणों में यक्ष, किन्नर एवं गंधर्वो की भांति नागों का भी वर्णन है। नाग, सूर्य के अवतार माने गए हैं, इसलिए नाग को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, नाग महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू की संतान हैं।
पुराणों के अनुसार, सूर्य के रथ में बारह सर्प (नाग) हैं, जो क्रमश: प्रत्येक माह में उनके रथ के वाहक बनते हैं। भगवान विष्णु क्षीर-सागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। शेषनाग ही रामावतार में लक्ष्मण और कृष्ण अवतार में बलराम के रूप में अवतरित हुए थे।
सुप्रसिद्ध संस्कृत कवि कल्हण ने राज तरंगिणी ग्रंथ में कश्मीर की धरती का दिव्य नागों के संबंध बताया है। वहां अनंतनाग नामक स्थान उसका ऐतिहासिक साक्ष्य है।
भविष्य पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में हुए समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा नामक अश्व (घोड़ा) निकला था। उसे देखकर नाग माता कद्रू ने अपनी सौत विनता से कहा, इस घोड़े का सफेद रंग है, किंतु बाल काले दिखलाई पड़ते हैं। विनता द्वारा यह बात स्वीकार न किए जाने पर दोनों में वाद-विवाद छिड़ गया।
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कद्रू ने नागों से अश्व के बाल के समान सूक्ष्म होकर उच्चैश्रवा के शरीर पर लिपट जाने को कहा, ताकि वह काले रंग का दिखाई देने लगे। पुत्र नागों द्वारा विरोध करने पर कद्रू ने क्रोधित होकर उन्हें राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्प-यज्ञ के दौरान भस्म हो जाने का शाप दे दिया।
तब ब्रह्माजी के वरदान से आस्तिक मुनि ने सर्प यज्ञ को रोककर नागों की प्राणरक्षा की। मान्यता है कि ब्रह्माजी द्वारा पंचमी के दिन वरदान दिए जाने और पंचमी के दिन ही आस्तिक मुनि द्वारा नागों की रक्षा किए जाने के कारण पंचमी तिथि नागों को समर्पित है।