
स्कंदपुराण में सोमेश्वर तीर्थ की महिमा को बहुत ही विस्तार से बताया गया है। इस पवित्र पुराण के अनुसार जब ब्रह्माजी सृष्टि का विस्तार करना चाहते थे, उस समय उनके ह्दय से महर्षि अत्रि का जन्म हुआ।
ब्रह्माजी के आदेशानुसार महर्षि अत्रि ने कई वर्षों तक तप किया, जिसके प्रभाव से तेज निकला उनका यह तेज सोम कहलाया। समस्त लोकों के कल्याण के लिए ब्रह्माजी ने अपने रथ में सोमदेव को स्थापित कर लिया। उस रथ पर बैठने के बाद सोमदेव ने 21 बार पृथ्वी की परिक्रमा की। जहां-जहां सोमदेव का तेज गिरा वहां समस्त प्रकार की औषधियां उत्पन्न होने लगीं।
इसके बाद सोमदेव ने ब्रह्माजी की कई वर्षों तक तपस्या की। इससे खुश होकर ब्रह्माजी ने सोमदेव को बीज, औषधि, जल का देवता बना दिया। ब्रह्माजी की आज्ञा से सोमदेव ने एक राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। इसमें उन्होंने सभी ऋर्षियों और राजाओं को आमंत्रित किया। यज्ञ समाप्त होते ही राजा दक्ष ने अपनी 27 कन्याओं का विवाह सोमदेव के साथ कर दिया।
एक दिन सोमदेव ने देवगुरु बृहस्तपति की पत्नी तारा को देखा। वह बहुत ही सुंदर थीं। ऐश्वर्य और रूप के मद में सोमदेव(चंद्रदेव) ने तारा का अपहरण कर लिया। उनके इस कार्य की समस्त लोकों में निंदा हुई। लेकिन वो तारा को लौटाने में सहमत नहीं हुए।
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सोमदेव के इस कृत्य से दुःखी होकर देवराज इंद्र ने उन पर आक्रमण कर दिया। लेकिन देवगण इस युद्ध में पराजित हुए। तब उन्होंने भगवान शिव से सहायता मांगी। जब इस बात का पता ब्रह्माजी को चला तो उन्होंने सोमदेव को समझाया, 'सोम! तुम देवों के देव महादेव से क्षमा मांगकर तारा को बृहस्तपतिदेव को लौटा दो। वे परम दयालु हैं तुम्हें माफ कर देंगे।
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ब्रह्माजी के कहने पर सोमदेव ने भगवान शिव से क्षमा मांग तारा को बृहस्पतिदेव को लौटा दिया। उस समय तारा गर्भवती थीं। इसलिए उन्होंने उस गर्भ को गिरा दिया। जिसके एक दिव्य बालक प्रकट हुआ। जब बालक के पिता का नाम ब्रह्माजी ने पूछा तो उसने स्वयं को सोमदेव का पुत्र सोमकुमार बताया जिसका नाम ब्रह्माजी ने बुध रख दिया।
क्रमशः