
धर्म डेस्क। भारतीय महाकाव्य महाभारत केवल युद्ध का वर्णन मात्र नहीं है, बल्कि यह धर्म और नीति का अद्भुत पाठ भी है। इसी महाकाव्य में एक प्रसंग आता है धर्मराज युधिष्ठिर के श्राप का, जिसे धार्मिक मान्यताओं में आज भी महत्व दिया जाता है। आइए इस श्राप की कथा को विस्तार से समझते हैं।
महाभारत के अनुसार, जब पांडवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त कर ली, तब उनकी माता कुंती ने एक ऐसा रहस्य प्रकट किया, जिसने युधिष्ठिर सहित सभी पांडवों को स्तब्ध कर दिया। कुंती ने रोते हुए बताया कि जिस कर्ण के खिलाफ उन्होंने युद्ध लड़ा, वह वास्तव में उनका ही पुत्र और पांडवों का सबसे बड़ा भाई था। विवाह पूर्व जन्म के कारण लोकलाज से बचने हेतु कुंती ने कर्ण को त्याग दिया था और यह सत्य युद्ध समाप्त होने तक छिपाए रखा।
यह सच्चाई सुनकर युधिष्ठिर क्रोध और वेदना से भर उठे। उन्हें लगा कि यदि यह सत्य समय रहते बता दिया गया होता तो इतना बड़ा विनाश टाला जा सकता था और उन्हें अपने ही भाई को मारने का दोष ना सहना पड़ता। इस रहस्य को दबाए रखने के लिए युधिष्ठिर ने कुंती के साथ-साथ पूरे स्त्री समाज को भी जिम्मेदार ठहराया।
दुःख, पश्चाताप और आक्रोश से व्याकुल होकर युधिष्ठिर ने अपनी माता सहित सभी स्त्रियों को यह श्राप दिया कि आगे से कोई भी महिला किसी बात को अपने मन में लंबे समय तक छिपा नहीं पाएगी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि आज भी इस श्राप का प्रभाव महिलाओं पर देखा जाता है। मान्यता है कि इसी कारण महिलाएं अपनी मन की बात या कोई भी गुप्त बात अधिक समय तक अपने भीतर नहीं रख पातीं और अंततः किसी न किसी से साझा कर देती हैं।
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