
18 पुराणों मे से एक है 'लिंग पुराण', इस पुराण में भगवान शिव की प्राचीन दिव्य कथाएं समाहित हैं। इस पुराण को 'शैव प्रधान पुराण' भी कहा जाता है। हालांकि 'लिंग' का अर्थ जननेन्द्रिय से है, लेकिन इस पुराम में लिंग का अर्थ ओंकार से संबंधित है।
लिंग पुराण में वैसे तो कई कथाएं हैं लेकिन राजा अम्बरीष की कथा का उल्लेख विशेष रूप से लिया जाता है। राजा अम्बरीष, राजा नाभाग के पुत्र थे। वह विष्णु भक्त थे। वह अपना ज्यादातर वक्त हरि के ध्यान में ही बिताते थे।
राजा बनने के बाद राजा अम्बरीष ने अश्वमेघयज्ञ कर विष्णु जी की पूजा-अर्चना की। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने राजा की सुरक्षा के लिए अपने सुदर्शन चक्र को नियुक्त किया। एक बार राजा अम्बरीष ने एक वर्ष तक द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। और उसे सफलता पूर्वक पूर्ण किया।
उसी दौरान उनके राज्य में ऋषि दुर्वासा का आगमन हुआ। उन्होंने ऋषि से भोजन का आग्रह किया। इस तरह वह भोजन से पहले यमुना नदी में स्नान के लिए चले गए। द्वादशी खत्म होने में कुछ समय ही रह गया। और ऋषि ने भोजन भी नहीं किया। इस कठिन समय में उन्होंने ऋषि से विचार-विमर्श किया।
ऋषियों ने कहा, शास्त्रों में वर्णित है कि द्वादशी व्रत में जल पीना भी भोजन के समान भी है और नहीं भी है। इसलिए आप जल पीकर द्वादशी का नियम पूर्ण कीजिए।' ऋषियों के कहे अनुसार राजा ने यही किया और ऋषि दुर्वासा की प्रतीक्षा करने लगे।
उधर, ऋषि दुर्वासा ने अपने तपोबल से जान लिया कि राजा अम्बरीष ने जल पीकर उनसे पहले भोजन किया है। वह बहुत नाराज थे। उन्होंने अपने सिर से जटा उखाड़ी और अम्बरीष को मार डालने के ले लिए एक दैवी शक्ति को उत्पन्न किया। राजा अम्बरीष डर गए, उन्होंने मन-ही-मन विष्णु जी का स्मरण किया। तब उस शक्ति को सुदर्शन चक्र ने काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
और अब सुदर्शन चक्र ऋषि दुर्वासा के पीछे चल दिया। ऋषि जल-थल और नभ तीनों में अपनी जान बचाने के लिए भटकते रहे। वह ब्रह्मलोक पहुंचे। ब्रह्माजी से उन्होंने आप-बीती कह सुनाई, ब्रह्माजी बोले तुमने विष्णु भक्त का अपमान किया है। तुम्हें सुरक्षा प्रदान करना हमारे वश में नहीं है।
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ऋषि दुर्वासा शिवलोक गए लेकिन वहां भी उन्हें सहायता नहीं मिली। तब वह विष्णुलोक पहुंचे। और श्रीहरि से क्षमा मांगी। तब विष्णु जी ने कहा यदि आपको माफी मांगनी है तो राजा अम्बरीष से मांगिए। ऋषि द्वारा माफी मांगने पर राजा अम्बरीष को उनपर दया आ गई। उन्होंने भगवान विष्णु से चक्र वापिस लेने के लिए कहा।
इस तरह राजा ने ऋषि दुर्वासा को भोजन करवाया और ऋषि दुर्वासा ने उन्हें आशीर्वाद देकर विदा हुए। राजा अम्बरीष ने कई वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य किया। इस तरह राजा अम्बरीष को अंत में उन्हें विष्णु धाम प्राप्त हुआ।