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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 30, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

बहुत कुछ कहती हैं ये परंपराएं

इस तरह से कुल मिलाकर ये चार महीने हमें हमारे अपने, हमारे परिवेश के लिए और प्रकृति के लिए मिले होते हैं।

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Publish Date: Wed, 30 Jul 2014 03:43:17 PM (IST)Updated Date: Thu, 31 Jul 2014 06:35:38 PM (IST)
बहुत कुछ कहती हैं ये परंपराएं

- स्वधा अतुल पंडित

श्रावण मास से चातुर्मास शुरू हो गया है। हरिशयन के साथ ही हर कोई सांसारिकता से मुक्त होकर ईश्वर भक्ति के लिए प्रवृत्त होते हैं। चारों ओर भक्ति की बयार बहने लगी है। शिवालयों में, धर्म स्थलों में, तीर्थ स्थानों पर और सत्संग, प्रवचनों में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ नजर आने लगती है।

गुरुपूर्णिमा से शुरू हुए तीज-त्योहारों का समापन देवउठनी एकादशी पर होता है। हमारी सांस्कृतिक परंपराओं की द्योतक इन त्यौहारों को मनाए जाने के मूल कारणों से अनभिज्ञ हम केवल परंपराओं का निर्वाह करते चले जाते हैं।

नागपंचमी, हरतालिका हो या फिर गणेश चतुर्थी सभी का धार्मिक महत्व है, इसके अतिरिक्त कोई दर्शन भी है। हमारे व्यवस्थाकार बहुत दूरदृष्टा रहे। उन्होंने पूरी व्यवस्था का खाका ही ऐसा बनाया है, जो इंसान के मनोविज्ञान, दर्शन, जरूरत और अर्थशास्त्र को ध्यान में रखता है।


जैसे-जैसे हम विकास की तरफ बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे हम मनुष्य से यंत्र होने की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। सब कुछ करते हैं, लेकिन फिर भी समय नहीं निकाल पाते हैं। इस लिहाज से तीज-त्योहार जीवन की एकरसता को खत्म करते हैं। दूसरे ये हमें हमारी जमीन, मिट्टी, परिवेश से भी जोड़ने का काम करते हैं।

सावन के महीने से ही प्रकृति का रूप बदलना शुरू हो जाता है। तो जाहिर है प्रकृति पूजा के लिए इससे बेहतर वक्त और कौन-सा होगा। सांपों का हमारी इकोलॉजी में क्या महत्व है, इसे बताने की जरूरत तो नहीं है। इसीलिए इन्हीं दिनों जब सांप भी ज्यादा नजर आते हैं। इसलिए नाग-पूजा की परंपरा है। इसके पीछे का दर्शन तो उनके संरक्षण का है, अब ये अलग बात है कि हमने इसे महज परंपरा बना डाला है।

यूं हरतालिका का लक्ष्य भी हमें मिट्टी से जोड़ने का ही है, नदी की मिट्टी या रेत से शिवलिंग का निर्माण और पूजा करना असल में हमें प्रकृति के और करीब ले जाने का ही उपक्रम है। इसी में महिलाओं का साथ रहना और हंसी-ठिठौली त्यौहारों का उल्लास जीवन में नयापन लाता है।

रक्षाबंधन तो आता ही लड़कियों के मायके आने के लिए होता है। गणेश चतुर्थी पर मिट्टी से बनी प्रतिमा की स्थापना और पूजन और फिर विसर्जन दरअसल हमें ये समझाने के लिए है कि आप जो कुछ भी हो, आखिर हो तो मिट्टी ही। इस तरह से कुल मिलाकर ये चार महीने हमें हमारे अपने, हमारे परिवेश के लिए और प्रकृति के लिए मिले होते हैं।