
हैदराबाद से 33 किलोमीटर दूर है उस्मान सागर, जहां है 'चिल्कुर बालाजी मंदिर'। यहां भक्त वीजा की चाह लेकर आते हैं और मनोकामना पूरी होने पर मंदिर की 108 परिक्रमा करके ही जाते हैं। यह मंदिर भगवान बालाजी और उनकी पत्नी श्री देवी और भू- देवी को समर्पित है। यही वह मंदिर है जिसे वीजा मंदिर भी कहा जाता है।
चिल्कुर बालाजी एक ऐसा मंदिर है जहां पर वीआईपी लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। यहां सभी को बराबर समझा जाता है। इसलिए अन्य मंदिरों की तरह यहां कोई विशेष प्रवेश द्वार नहीं है।
हनुमान जी के इस मंदिर में प्रबंधन की एक अलग ही व्यवस्था है। यहां धन की व्यवस्था, यहां आने वाले भक्तों और पर्यटकों से ली गई पार्किंग फीस से जुटाई जाती है। भारत में इस मंदिर के आलावा गुजरात के राजकोट में जलाराम मंदिर में भी कोई चढ़ावा या दान नहीं लिया जाता है। वहां भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है।
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चिल्कुर बालाजी मंदिर का इतिहास लगभग 400 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। चिल्लुर बालाजी, तिरुपति बालाजी के ही दुसरे रूप माने जाते हैं। किंवदंती के अनुसार बालाजी के एक परम भक्त थे। वह हर साल तिरुपति जाया करते थे। लेकिन एक बार जब वे इस यात्रा पर निकले तो चिल्कुर के पास ही विश्राम करने के लिए रुक गए।
उनकी परेशानी भगवान से देखी नहीं गई और सपने में उन्होंने अपने भक्त को बताया की उन्हें तिरुपति आने की जरूरत नहीं, वह स्वयं ही चिल्कुर की पहाड़ी में विराजमान है। जागने के बाद भक्त ने स्थानियों से ये बात कही और फिर उस पहाड़ी से भगवान् बालाजी की प्रतिमा लाकर यहां स्थापित की गई।
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धीरे-धीरे चिल्कुर बालाजी के नाम से यह मंदिर प्रसिद्ध हो गया। चिल्कुर बालाजी मंदिर में ही साल 2011 भारत में मंदी के दौरान पूजा-पाठ किया गया था। उस समय यह मंदिर काफी चर्चा में रहा था।