
सूर्यनारायण मिश्रा, उज्जैन। भारतवर्ष में 52 शक्तिपीठों में से एक शक्ति पीठ उज्जैन में है मां हरसिद्धि। बताया जाता है कि जिस स्थान पर माता सती की कोहनी गिरी थी, वह स्थान हरसिद्धि शक्तिपीठ कहलाया। यह मंदिर महाकाल मंदिर से पश्चिम दिशा की ओर स्थित है।
हरसिद्धि मंदिर और महाकाल मंदिर के मध्य में रुद्र सागर स्थित है। बताया जाता है कि यहां कभी कमल खिला करते थे। बताया जाता है कि मां हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी भी रही हैं। पुराणों में वर्णित उज्जैन के प्राचीन मंदिरों में मां हरसिद्धि भी एक है। मां हरसिद्धि का यह मंदिर पूर्वाभिमुख है।
मंदिर परिसर में एक बावड़ी भी है। किसी समय इस बावड़ी को हर कोई आते-जाते आसानी से देख पाता था। आसपास चप्पल स्टैंड बनने और बावड़ी के मुख्य द्वार पर दरवाजा लगाने से इस श्रद्धालुओं का इस ओर ध्यान भी नहीं जाता है।
मंदिर के सामने दो विशाल दीपस्तंभ बने हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र के अवसर पर तो ये पूरे नौ दिनों तक सैकड़ों दीपों से जगमगाते हैं। नवरात्र के अलावा भी यदि कोई श्रद्धालु इन दीप स्तंभ को दीपों से रोशन करवाना चाहे तो मंदिर समिति में निर्धारित शुल्क जमा कर इन दोनों दीपस्तंभों में दीये रोशन करवा सकता है।
मंदिर के गर्भगृह में पीछे भगवती अन्नपूर्णा, नीचेकी ओर महाकाली तथा आसपास महालक्ष्मी व महासरस्वती की मूर्तियां स्थापित हैं। पास में ही भैरव की छोटी मूर्ति है। सभामंडप में दीवारों पर दश महाविद्याओं के चित्र निर्मित किए गए हैं। मंदिर परिसर में ही स्थित एक गुफा में माता महामाया विराजित है।
इस गुफा में कई वर्षों से अखंड ज्योत जल रही है। इस गुफा में श्रद्धालुओं का प्रवेश नहीं होता है। ऊपर की ओर बने तीन गोल छेद से ही मां महामाया के दर्शन किए जाते हैं। मंदिर परिसर में ही कर्कोटेश्वर महादेव मंदिर, श्री गणेश मंदिर, देव मंडल, गणेश मंदिर, बाबा बाल विजय हनुमान मंदिर है।
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मंदिर को लेकर कथा प्रचलित है कि सतयुग में राजा दक्ष प्रजापति ने बृहस्पति यज्ञ किया था। इसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था, परंतु शिव को आमंत्रित नहीं किया। इस पर राजा दक्ष की पुत्री माता सती ने यज्ञ में जाने की इच्छा जाहिर की। पति शिव की इच्छा के विपरीत माता सती यज्ञ में पहुंचीं। वहां स्वयं का अनादर होने व पति की अनुपस्थिति से आहत हो माता सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। जब शिवजी को यह बात पता चली तो वे सती की देह को कंधों पर लिए क्रोध में चहुंओर विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव के टुकड़े कर दिए। इस प्रकार माता सती के अंग धरती पर जहां-जहां गिरे, वह स्थान शक्तिपीठ कहलाए। उज्जैन में जहां हरसिद्धि मंदिर है, वहां कोहनी गिरना बताया जाता है।