- देवदत्त पटनायक

संस्कृत शब्द 'आत्मा' का अनुवाद अक्सर अंग्रेजी में 'सोल' या फिर 'स्पिरिट' के रूप में किया जाता है। मगर इन तीनों शब्दों की जड़ें अलग-अलग हैं और अर्थ भी। 'स्पिरिट' ग्रीक मूल का है, 'सोल' ईसाई मूल का और 'आत्मा' हिंदू मूल का।

ग्रीस में लोग मानते थे कि जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो उसकी रूह या उसका 'भूत' स्टिक्स नदी को पार कर परलोक तक यात्रा करता है। मृतक के मुंह में एक सिक्का डाला जाता था, ताकि वह नदी पार कराने वाले नाविक को किराया अदा कर सके। जो उसे सिक्का नहीं दे पाते, उनकी रूह इसी लोक में रह जाती और जीवित लोगों को डराती है।

अट्ठारहवीं सदी में 'स्पिरिचुअल' का अर्थ भूत-प्रेतों की दुनिया से संवाद करना होता था। आज 'सायकोलॉजी' का मतलब होता है मन का विज्ञान लेकिन बीसवीं सदी से पहले इस शब्द का प्रयोग शरीर पर कब्जा कर बैठे भूत-पिशाच के अध्ययन के लिए होता था। इस प्रकार तार्किकता और तंत्र-मंत्र आपस में गुंथे हुए थे।

आज भी जब लोग 'स्पिरिचुअल' शब्द का प्रयोग करते हैं, तो वास्तव मे वे एक अतार्किक, अमूर्त और पारलौकिक समाधान की तलाश कर रहे होते हैं।

ईसाई पौराणिक कथाओं में प्रयुक्त 'सोल' शब्द का अनुवाद यदि 'आत्मा' किया जाए, तो यहां पवित्र आत्मा, भ्रष्ट आत्मा, पापी आत्मा भी होती है। शैतान को आत्मा बेच देने का जिक्र भी आता है और बिना आत्मा के शरीर का भी। कई बार यहां आत्मा और अंत:करण को एक ही मान लिया जाता है। इस बात पर लंबी-चौड़ी बहसें भी हुई हैं कि क्या पशुओं में भी आत्मा होती है?

जब उनमें अंत:करण नहीं होता, तो आत्मा कैसे हो सकती है? यह भी कहा गया है कि मानव आत्मा खास होती है क्योंकि वह तार्किक होती है। इसका मतलब यह हुआ कि आत्मा को मस्तिष्क से जोड़ा जा रहा है!

ग्रीक 'स्पिरिट' का ईश्वर या नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन ईसाई 'सोल' का था। ये दोनों विचार 'आत्मा' की हिंदू अवधारणा से अलग हैं। यहां माना जाता है कि एक जीव में जीवात्मा होती है और सारे जीवों में परमात्मा। गीता में कहा गया है कि आत्मा अपरिमित है, अमर है। इसे विभाजित नहीं किया जा सकता।

यह पवित्र है। इसे भ्रष्ट नहीं किया जा सकता। यह एकाधिक जन्म लेती है। कर्म के अनुसार यह एक के बाद दूसरा जीवन पाती है। इस प्रकार आत्मा वैतरणी पर दोनों दिशाओं में कई बार यात्रा करती है।

भूलोक से पितृलोक और पितृलोक से वापस भूलोक। ऋगवेद में आत्मा को रूपकात्मक ढंग से ऐसे पक्षी के रूप में बताया जाता है जो दूसरे पक्षी (हमारे मन) को फल (हमारे आसपास का विश्व) खाते हुए देख रहा है।

दूसरे शब्दों में कहें, तो वह, जो देह को भौतिक सत्य का अनुभव करते देखती है। यह देह मानव भी हो सकती है, पशु भी, पौधा भी और यहां तक कि चट्टान भी। अज्ञान हमें नश्वरता में कैद कर लेता है। इसीलिए हम अपने जीवन की पुष्टि को लेकर भयाक्रांत रहते हैं।

ज्ञान हमें बताता है कि आत्मा तो अजर-अमर है, अत: उसे किसी प्रकार का डर नहीं। इस बात का ज्ञान होना ही मोक्ष पाना है। यहां आत्मा का संबंधआत्म ज्ञान या चेतना से है। हिंदू मान्यता है कि आत्मा सभी जगह है, जबकि जैन मत है कि आत्मा केवल जीवधारियों में होती है।

वहीं बौद्ध मत कहता है कि आत्मा जैसा कुछ होता ही नहीं! वह भी मिथ्या ही है क्योंकि प्रकृति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। अत: 'आत्मा', 'सोल' और 'स्पिरिट' तीनों के तात्पर्य अलग-अलग हैं।

Posted By: Amit