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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 07, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

भगवान विट्ठल दर्शन की कामना में यहां उठते हैं पग

अपने माता-पिता की सेवा में लीन पुंडलिक को प्रेम से निहारते उसकी फेंकी ईंट पर 28 युगों से खड़ा विट्ठल।

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Publish Date: Mon, 07 Jul 2014 04:29:46 PM (IST)Updated Date: Mon, 18 Aug 2014 01:47:55 PM (IST)
भगवान विट्ठल दर्शन की कामना में यहां उठते हैं पग

- ज्योत्सना भोंडवे

अपने माता-पिता की सेवा में लीन पुंडलिक को प्रेम से निहारते उसकी फेंकी ईंट पर 28 युगों से खड़ा विट्ठल। जो सिर्फ और सिर्फ भक्ति का भूखा है। पंढरपुर के विठोबा महाराष्ट्र के लोकदेव हैं जिन्हें पंढरीनाथ, पांडुरंग, विट्ठल, विठोबा या विठु, मादुली किसी भी नाम से पुकारें वास्तव में वे योगेश्वर कृष्ण के ही रूप हैं। विट्ठल यह उस नाव का नाम है जिस में बैठकर भवसागर से पार उतरा जा सकता है और प्रतिवर्ष पंढरपुर की वारी (तीर्थयात्रा) करनेवाला वारकरी पार उतरने की ही यात्रा करता है।

महाराष्ट्र को सही मायनों में महाराष्ट्र बनाने और समाज में एकरूपता लाने का श्रेय इसी वारकरी संप्रदाय और खासतौर से वारकरी संतों को जाता है जिन्होंने एक धर्म, एक देव, एक भाषा और परंपरा दी। इसी जन-जन तक पहुंचने की शक्ति के कारण ज्ञानयोगी संत ज्ञानेश्वर वारकरी बने, जिनके उपास्य देव विट्ठल हैं।


पंढरी की वारी यानी एक बुझौवल। किसी भी जात-पात, वंश का भेद न पालते सैकडों वर्षों से लाखों भक्त बड़ी आस्था से पंढरी की वारी में शामिल होते हैं। उन सभी का लक्ष्य, लगन एक ही होती है... विठोबा।

सालोंसाल विठोबा से मिलने की यह कामना मन में बनी रहती है। हर साल दूने उत्साह, आतुरता, श्रद्धा और भक्तिभाव से जतन किया जाता है। कितनी पीढ़ियां आईं, दौर बदला, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ, मूल्य बदले, लेकिन फिर भी विट्ठल भक्ति का यह सोता अविरत बह रहा है।

विठोबा की भक्ति बाबद एक खास बात यह भी कि उन्हें हम देवता कहते हैं, उनकी भक्ति करते हैं लेकिन कुछ अपवाद छोड़ें तो यह देवता, उसकी भक्ति कर्मकांड से परे है। आमजनों के मन में उनके प्रति श्रद्धा इतनी है कि वारी में शामिल होने के लिए कोई पीले चावल और निमंत्रण नहीं देना पड़ते, सैकडों किलोमीटर की दूरी पैदल तय करने के लिए न तो कोई बख्शीश है ना ही किसी सुविधा की उम्मीद। होती है तो बस अदम्य इच्छा। किसी भी कर्मकांड से देवता बड़ा नहीं होता है, उसकी मान्यता तो इसी में है कि वह भक्तों के हृदय में कितना गहरे बैठा है।

नियम से वारी में आना वारकरियों के लिए हर साल का काम है। जो कभी जनम-मरण के बंधन से मुक्ति की मांग नहीं करते क्योंकि मुक्ति मिलने से वे पुनर्जन्म के बंधन से निकल जाएंगे और पुनर्जन्म नहीं तो विट्ठल की भक्ति का आनंद भी दुबारा नहीं होगा।

हर वारकरी के जीवन की अभिलाषा यही होती है कि हर जनम में उसे विट्ठल भक्ति का लाभ मिले। पंढरपुर पहुंचने पर सिर्फ मंदिर के शिखर कलश के दर्शन कर चंद्रभागा (भीमा नदी) में स्नान कर वह अपने गांव लौट जाता है अगली आषाढ़ी की वारी में फिर विट्ठल के दर्शन की आस लिए।