जब पांडव राजा विराट के यहां अज्ञातवास में रहे, तो उन्होंने बहुत कुछ ऐसा किया जो उनके व्यवहार से बिल्कुल अलग था। इस बात का विस्तार से वर्णन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित और भगवान श्री गणेश जी द्वारा लिखित महान ग्रंथ महाभारत में मिलता है।

उस समय धर्मराज युधिष्ठर ने गेरुए वस्त्र पहन सन्यासी का वेश धारण किया। अर्जुन ने स्त्री रूप धारण किया ताकि कोई भी व्यक्ति उन्हें पहचान न सके।

युधिष्ठिर कंक के नाम से विराट के दरबारी बन गए और राजा विराट के साथ चौपड़ खेलकर दिन बिताने लगे। भीमसेन ने रसोईयों के मुखिया का दायित्व संभाला। भीमसेन कभी-कभी पहलवानों से कुश्ती लड़कर और हिंसक पशुओं को वश में कर, राजा का दिल बहलाया करता था।

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अर्जुन बृहन्नला के नाम से रनिवास में स्त्रियों को खासतौर पर राजा विराट की कन्या उत्तरा और उसकी सहेलियों एवं दास-दासियों को नाच और गाना-बजाना सिखाते थे।

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नकुल, घोड़ों को चारा खिलाना उन्हें नहलाना और उनकी बीमारियों से इलाज के लिए दवा देने का काम किया करते थे। सहदेव गाय बैलों की देखभाल करते थे।

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वहीं, पांचाल नरेश द्रुपद की कन्या और पांडवों की पत्नी द्रौपदी, जिनकी सेवा में असंख्‍य दासियां रहती थीं राजा विराट की पत्नी सुदेष्णा की सेवा करती थीं।

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