
कई जातक कहानियों में इस कहानी का उल्लेख मिलता है। कहानी कुछ इस तरह है कि 'नर बया ने तिनका-तिनका जोड़कर घोंसला बनाया।
जब घोंसला बन गया तो वह रोज दूर-दूर तक उड़कर जाया करता था। वह रोज अपने लिए एक मादा बया तलाश रहा था। जो उसके साथ रहना पसंद करे। इस बीच कई मादा बया उसके साथ रहने आईं। उसके घोंसले को देखतीं, शायद उन्हें उसका घोंसला पसंद नहीं आता और दोबारा नहीं आतीं।
नर बया फिर से अपना घोंसला दुरुस्त करने में लग जाता। एक दिन अचानक उसे अपना साथी मिल गया। ऐसे ही बनते हैं पक्षियों के जोड़े। जिन्हें हम इंसान विवाह भी कह सकते हैं लेकन इस जीव जगत में बहुत कम ऐसे पक्षी हैं जो विवाह पद्धति की तरह ही रहते हैं।
अमूमन बया पक्षी अपने जोड़ों के साथ सुंदर घोंसलों में रहते हैं। कभी कोई बया अकेले नहीं रहता। यदि नर बया कभी बे-बफाई करता है तो उसे अपने लिए दूसरा घोंसला बनाना पड़ता है। लेकिन बया पक्षी ऐसा नहीं करते। अमूमन वह अपने पवित्र रिश्ते को आजीवन निभाते हैं।
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ऐसे ही अनेकानेक किस्से कहानियों से जीवन की रुचियां, संस्कार और सौंदर्य बोध बनते हैं जो बातें मनुष्य को समझ नहीं आतीं उसे समझने के लिए वह प्रकृति के नियमों का अनुसरण करता है।
हनुमानजी का सुवर्चला से विवाह
पराशर संहिता में उल्लेख मिलता है कि हनुमानजी (हनुमानजी वानर रूप में अवतरित हुए), जब भगवान सूर्य से शिक्षा ले रहे थे तो उन्हें भी कुछ विद्याओं के लिए विवाह करना पड़ा था। तब उन्होंने सूर्य की पुत्री सुवर्चला से विवाह किया। हालांकि विवाह के बाद सुवर्चला तपस्या में लीन हो गईं। तब हनुमानजी ने विद्याग्रहण की और भगवान श्रीराम की भक्ति में रम गए।
शुकदेव का पीवरी से विवाह
श्रीमद्भागवत में उल्लेख मिलता है कि मुनिश्रेष्ठ शुकदेव जी ( शुकदेव मूल रूप में तोता थे) महर्षि वेदव्यास जी के पुत्र थे। उन्होंने प्रारंभिक अध्ययन अपने पिता वेदव्यासजी से ही उनके आश्रम में किया।
गृहस्थाश्रम के प्रति उनको कोई दिलचस्पी नहीं थीं लेकिन महर्षि व्यासजी चिंतित थे। व्यास जी जहां गृहस्थाश्रम से श्रेष्ठ कोई दूसरा धर्म नहीं मानते वहीं शुकदेव जी गृहस्थाश्रम के कष्ट गिनाते।
व्यास जी शुकदेव को समझाते ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी तथा गृहस्थी सभी गृहस्थाश्रम से ही पैदा होते हैं। वेद और स्मृतियों के विधानानुसार भी गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है तथा तीनों अन्य आश्रम वालों का पोषणकर्ता भी गृहस्थाश्रम है, यहां तक कि देवता भी अपना पोषण गृहस्थाश्रम से ही पाते हैं।
व्यास जी उन्हें समझाते कि मनुष्य के चार ऋण होते हैं। पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण और मनुष्य ऋण। इन ऋणों की मुक्ति गृहस्थाश्रम से ही संभव है। जहां वह माता-पिता की सेवा व भरण-पोषण कर पितृ ऋण से, यज्ञादि सम्पन्न कराकर देव ऋण से, वेदों का अध्ययन और तपस्या कर ऋषि ऋण से तथा दान, दया, सहायता आदि द्वारा मनुष्य ऋण से उऋण हो सकता है।
कई उदाहरण देकर व्यास जी जब शुकदेव जी को गृहस्थाश्रम के लिए तैयार नहीं कर सके तो उन्होंने शुकदेव जी को अपने यजमान मिथिलापुरी नरेश राजा जनक के पास धर्म और मोक्ष का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने हेतु भेजा।
राजा जनक गृहस्थ होते हुए भी प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग के पूर्ण थे। यही नहीं वे शास्त्र मर्यादानुसार- रहकर गृहस्थी ही नहीं अपितु सुचारू रूप से राज्य संचालन भी करते थे। वे अपने को राजा नहीं बल्कि प्रजा का प्रतिनिधि मानते थे।
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राजा जनक ने शुकदेव जी की अनेकानेक विधियों से परीक्षा ली और अन्त में राजा ने उनकी गृहस्थाश्रम की शंकओं का समाधान किया तथा यह भी बताया कि सभी आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही सबसे बड़ा आश्रम है। राजा के उपदेशों से शुकदेव मुनि की शंकओं का सामधान हो गया और वे अपने पिता के आश्रम में आ गये।
इस तरह शुकदेव जी का विवाह वहिंषद जी, जो स्वर्ग में वभ्राज नाम के सुकर लोक में रहने वाले पितरों के मुखिया थे, की पुत्री 'पीवरी' से हुआ। विवाह के समय शुकदेव जी 25 वर्ष के थे। गृहस्थाश्रम में रहकर भी शुकदेव जी योग मार्ग का अनुसरण करने लगे।