
जैन धर्म में अहिंसा को परम धर्म माना गया है। इस धर्म को मानने वाले अनुयायी ईश्वर या सृष्टिकर्ता को नहीं मानते वो तीर्थंकर को मानते हैं।
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी हैं। वैदिक परम्परा में इन्हें आठवां अवतार माना गया है। ऋषभदेव के दो रानियां थीं। यशस्वती और सुनंदा। भगवान ऋषभदेव की दूसरी रानी यानी सुनन्दा ने 'बाहुबली' नाम के एक पुत्र और 'सुंदरी' नाम की कन्या का जन्म दिया।
ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मसि आदि षट् क्रियाओं का उपदेश दिया। इस तरह प्रजा उन्हें युगादि पुरुष, विधाता, प्रजापति आदि नामों से पुकारने लगी।
किसी समय ऋषभदेव राजपाट से विरक्त हो वन को जाने लगे तब उन्होंने पहली रानी से उत्पन्न पुत्र भरत को अयोध्या का राज्य सौंपा और अपने दूसरी रानी से उत्पन्न पुत्र बाहुबली को पोदनपुर का अधिकारी बनाया।
इसी तरह उन्होंने यशस्वती द्वारा उत्पन्न 99 पुत्रों को भी अन्य देशों का राज्य देकर आप मुनि मार्ग अपनाकर दिगम्बर मुनि हो गए।
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इसी बीच ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने एक वर्ष तक योग साधना के द्वारा अनेक ऋद्धि-सिद्धियां प्राप्त कर परम ज्योति स्वरूप केवल ज्ञान को प्रगट किया था।
कहते हैं महामुनि बाहुबली तपस्या में इतने मग्न थे कि वो वर्ष भर निश्चल खड़े रहे। सर्पों ने वामियां बना लीं, लताएं उनके शरीर से लिपट गईं और चिड़ियों ने घोंसले बना लिए फिर भी वे आत्मतत्त्व के चिंतन में और परमात्म तत्त्व के ध्यान में स्थिर थे।
भगवान बाहुबलि की दिव्य प्रतिमाएं
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