
प्राचीन काल में शाप देना आम बात हुआ करती थी लेकिन वर्तमान में यह बिल्कुल भी संभव नहीं। शाप के बारे में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। जिनमें से काफी हमने सुनी भी हैं। इन्हीं में से एक है। मृत्यु के देवता यमराज को मिले शाप की कथा।
एक बार एक ऋषि के कोप से उपजे शाप से यमराज को भी सामना करना पड़ा था। तब उन्होंने यमपुरी छोड़ दी थी। इस बात का उल्लेख महर्षि वेदव्यास के ग्रंथ महाभारत में वर्णित है। इस ग्रंथ को भगवान श्री गणेश जी ने लिखा है।
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दरअसल ऋषि मंदव्य को एक राजा ने चोरी के आरोप में सूली पर चढ़ा दिया था। लेकिन कई दिनों तक सूली पर लटकने के बाद भी ऋषि मंदव्य की मृत्यु नहीं हुई। इस पर राजा हैरान हो गया। उसने अपने निर्णय पर फिर विचार किया।
तब राजा को यह महसूस हुआ कि भूलवश उसने गलत इंसान को आरोपी ठहराकर सजा दे दी है। राजा को अपने निर्णय पर बेहद दुःख हुआ। लेकिन अपनी गलती का अहसास होते ही राजा ऋषि के पास पहुंचा और उनसे क्षमा-याचना की।
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इसके बाद ऋषि का देहावसान हो गया। अपनी मृत्यु के बाद जब मंदव्य ऋषि यमपुरी पहुंचे तो उन्होंने यमराज से पूछा, 'उन्हें किस पाप की इतनी बड़ी सजा दी गई थी जो उन्हें चोरी के आरोप में सूली पर लटकना पड़ा?'
यमराज ने मंदव्य ऋषि को बताया कि बारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने पतंगे की पूंछ में एक सूई चुभा दी थी। इसलिए उन्हें ऐसी सजा मिली। यमराज से यह सुन ऋषि क्रोधित हो उठे और यमराज को शाप देते हुए उन्होंने कहा कि 12 वर्ष का बच्चा इतना समझदार नहीं होता और अगर यह सिर्फ बचपन की एक भूल थी तो उसकी इतनी बड़ी सजा अन्याय है।
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मंदव्य ऋषि ने शाप दिया कि, 'यमराज मैं तुम्हें शाप देता हूं तुम एक अछूत के घर में जन्म लोगे।' मंदव्य ऋषि के इस शाप के कारण ही यमराज ने विदुर के रूप में धरती पर जन्म लिया था। वह महाभारत के मुख्य पात्रों में से थे। और उनकी विदुर नीति वर्तमान युग में भी मान्य है।