उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में है 'बरसाना'। बरसाना का प्राचीन नाम वृषभानुपुर था। यह ही वृषभानुपुर है जहां राधा जी का जन्म हुआ था। यहां राधावल्लभ मंदिर है। जिसका जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
मान्यता है कि यदि राधा जी के बिना श्री कृष्ण की आराधना की जाती है तो वह सफल नहीं होती है। भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ तो राधा जी ने भाद्र माह में ही शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्म लिया था।
राधा या रुक्मिणी
श्री कृष्ण की पहली पटरानी देवी रुक्मिणी का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। राधा जी के जन्म में और देवी रूक्मिणी के जन्म में एक अन्तर यह है कि देवी रूक्मिणी का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधा जी का शुक्ल पक्ष में।
कहते हैं राधा जी को नारद जी द्वारा दिए गए श्राप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रूक्मिणी और श्री कृष्ण प्रणय सूत्र में बंध गए। राधा और रूक्मिणी जी दिखने में अलग अलग हैं लेकिन दोनों ही माता लक्ष्मी का अंश हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी की परीक्षा लेने के लिए अपनी माया से एक नगर का निर्माण किया। उस नगर के राजा ने अपनी रूपवती पुत्री के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंवर में
नारद मुनि भी पहुंचे। वह कामदेव के वाणों से घायल होकर राजकुमारी को देखकर मोहित हो गए। राजकुमारी से विवाह की इच्छा लेकर वह भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे निवेदन करने लगे कि प्रभु मुझे आप सुंदर रूप प्रदान करें क्योंकि मुझे राजकुमारी से प्रेम हो गया है और मैं उससे
विवाह की इच्छा रखता हूं नारद जी के वचनों को सुनकर भगवान मुस्कुराए और कहा तुम्हें हरि(वानर) रूप देता हूं। जब नारद विष्णु रूप लेकर स्वयंवर में पहुंचे तब उस राजकुमारी ने विष्णु जी के गले में वर माला डाल दी नारद जी वहां से दु:खी होकर चले आ रहे थे मार्ग में उन्हें एक जलाशय दिखा जिसमें उन्होंने चेहरा देखा तो समझ गए कि विष्णु भगवान ने उनके साथ छल किया है और उन्हें वानर रूप दिया है।
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नारद गुस्सा होकर बैकुण्ठ पहुंचे। विष्णु भगवान को श्राप दिया कि, 'आपको भी प्राण प्रिया का वियोग सहना होगा'। नारद जी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्र जी को सीता माता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में श्री राधा का वियोग सहना पड़ा।