
धर्म डेस्क। रामायण के युद्ध में रावण की सेना का सबसे भयानक योद्धा और उसका ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद था। उसकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने साक्षात स्वर्गराज इंद्र को परास्त कर बंदी बना लिया था, जिसके कारण ब्रह्मा जी ने उसे 'इंद्रजीत' की उपाधि दी थी।
परंतु, एक ऐसा योद्धा जिसके पास अस्त्र-शस्त्रों और मायावी शक्तियों का असीम भंडार था, उसका अंत कैसे हुआ? इसके पीछे छिपा है एक कठिन वरदान और लक्ष्मण जी का 14 वर्षों का अखंड तप।
रामचरितमानस के लंका कांड के प्रसंगों के अनुसार, मेघनाद ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर अजेय होने का वरदान मांगा था। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान देते समय एक ऐसी शर्त रख दी जो किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए असंभव प्रतीत होती थी। शर्त के अनुसार, मेघनाद का वध केवल वही कर सकता था जिसने:
मेघनाद जिसे अपनी जीत का आधार मान रहा था, वही उसकी मृत्यु का कारण बना। भगवान श्री राम के भाई लक्ष्मण ने अनजाने में ही अपनी सेवा और भक्ति से इन शर्तों को सिद्ध कर दिया था:
मेघनाद अपनी शक्तियों को और अधिक घातक बनाने के लिए 'निकुंभला देवी' का गुप्त यज्ञ कर रहा था। विभीषण ने श्री राम को आगाह किया कि यदि यह यज्ञ संपन्न हो गया, तो मेघनाद को कोई भी शक्ति नहीं मार पाएगी।
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विभीषण के मार्गदर्शन में लक्ष्मण जी ने यज्ञ स्थल पर धावा बोलकर उसे भंग कर दिया। यज्ञ अधूरा रह जाने से मेघनाद की मायावी शक्तियां क्षीण हो गईं। अंततः, एक भीषण संग्राम के बाद लक्ष्मण जी ने अपने बाणों से मेघनाद का मस्तक धड़ से अलग कर दिया, और इस तरह एक अहंकारी अति-महारथी का अंत हुआ।
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