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धर्म डेस्क। भोग अर्पित करने की परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि जीवन में पवित्रता, संयम और कृतज्ञता का भाव जगाने का माध्यम है। आइए जानते हैं कि भगवान को भोग क्यों लगाया जाता है, ‘अन्न दोष’ क्या होता है और साधारण भोजन भोग के बाद प्रसाद कैसे बन जाता है।
धर्म डेस्क। सनातन धर्म में पूजा-पाठ के दौरान भगवान को भोग अर्पित करना एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है। अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि जब स्वयं ईश्वर ही सृष्टि के पालनहार और अन्नदाता हैं, तो उन्हें भोजन चढ़ाने का क्या अर्थ है? क्या भगवान वास्तव में भोजन ग्रहण करते हैं? शास्त्रों और आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे गहरा भावार्थ छिपा है।
हिंदू धर्म में भोग लगाना भगवान के प्रति समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक है। इसका संदेश यह होता है कि जीवन में हमें जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, वह ईश्वर की कृपा से है।
जब हम भोजन का पहला अंश भगवान को अर्पित करते हैं, तो यह अहंकार त्यागने और धन्यवाद प्रकट करने का भाव होता है। मान्यता है कि भगवान भोजन नहीं, बल्कि भक्त की श्रद्धा और भाव को स्वीकार करते हैं।
शास्त्रों में भोजन से जुड़े तीन प्रकार के दोष बताए गए हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘अन्न दोष’ कहा जाता है-
अर्थ दोष - गलत या अधार्मिक तरीके से अर्जित धन से बना भोजन
निमित्त दोष - अपवित्र स्थान या अशुद्ध अवस्था में बनाया गया भोजन
भाव दोष - भोजन बनाते समय मन में क्रोध, द्वेष या नकारात्मक विचार
ऐसा माना जाता है कि बिना भोग लगाया भोजन करने से ये दोष व्यक्ति के मन और शरीर को प्रभावित कर सकते हैं।
जब भोजन को मंत्रोच्चार और शुद्ध भाव के साथ भगवान को अर्पित किया जाता है, तो ईश्वर की कृपा से भोजन के सभी मानसिक और आध्यात्मिक दोष नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद वही भोजन प्रसाद कहलाता है, जिसे ग्रहण करने से मन शांत होता है और सात्विकता बढ़ती है।
रसोई में बना भोजन केवल शरीर की भूख मिटाने का साधन होता है, लेकिन जैसे ही वह भगवान को अर्पित किया जाता है, उसका स्वरूप बदल जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से पत्र, पुष्प, फल या जल भी अर्पित करता है, वह उन्हें स्वीकार्य होता है। भोग लगाने से व्यक्ति के भीतर सेवा भाव विकसित होता है और अहंकार का क्षय होता है।
भगवान को भोग लगाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और पवित्र बनाने का आध्यात्मिक मार्ग है। इससे न केवल अन्न दोष से मुक्ति मिलती है, बल्कि मन, विचार और कर्म भी शुद्ध होते हैं।