
धर्म डेस्क। दशहरे के दिन रावण वध और अधर्म पर धर्म की विजय की कहानी तो हर कोई जानता है, लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद लंका के राजमहल के भीतर क्या हुआ, यह आज भी एक बड़ा और दिलचस्प रहस्य है। रावण की मृत्यु के बाद लंका पूरी तरह अनाथ और तबाह हो चुकी थी। महारानी मंदोदरी के सामने न केवल अपने पति, पुत्रों और सगे-संबंधियों को खोने का अगाध दुख था, बल्कि लंका के भविष्य की एक बेहद डरावनी और असुरक्षित तस्वीर भी थी।
रामायण और पौराणिक संदर्भों के अनुसार, रावण के वध के बाद विभीषण का लंका के राजा के रूप में राज्याभिषेक तो कर दिया गया, लेकिन इसके बाद मंदोदरी ने विभीषण को अपने नए जीवनसाथी के रूप में भी स्वीकार किया। आखिर एक परम पतिव्रता स्त्री ने समय की मांग पर ऐसा कठोर फैसला क्यों लिया? आइए इसके पीछे के तीन सबसे बड़े और महत्वपूर्ण कारण जानते हैं।

विद्वानों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद लंका की आम प्रजा विभीषण को आसानी से अपना राजा मानने को तैयार नहीं थी। प्रजा की नजरों में विभीषण एक 'कुलद्रोही' थे, जिन्होंने युद्ध में अपने भाई का साथ छोड़कर शत्रु का साथ दिया था। ऐसे में लंका में गृहयुद्ध और नए विद्रोह की पूरी आशंका बनी हुई थी।
इस स्थिति को भांपते हुए भगवान श्रीराम ने स्वयं विभीषण को सुझाव दिया कि लंका की सत्ता को राजनीतिक स्थिरता देने और प्रजा का विश्वास जीतने के लिए उन्हें महारानी मंदोदरी से विवाह कर लेना चाहिए, क्योंकि लंका की प्रजा मंदोदरी का बेहद सम्मान करती थी।
कहा जाता है कि शुरुआत में मंदोदरी इस विवाह प्रस्ताव के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं और उन्होंने राजमहल छोड़कर एकांतवास चुन लिया था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि बिना किसी कुशल और सम्मानित नेतृत्व के लंका की बची-कुची सेना और अनाथ हो चुकी प्रजा आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाएगी, तो उन्होंने राष्ट्रहित में अपनी व्यक्तिगत भावनाओं का बलिदान दे दिया।
मंदोदरी भली-भांति जानती थीं कि विभीषण धर्मात्मा हैं और उनके साथ मिलकर ही लंका को दोबारा खुशहाल और सुरक्षित बनाया जा सकता है।
युद्ध में रावण के वंश के लगभग सभी पुरुष और योद्धा मारे जा चुके थे। राजकुल की अनगिनत विधवा स्त्रियां, दासियां और अनाथ बच्चे पूरी तरह बेसहारा हो चुके थे। उन्हें बाहरी आक्रमणकारियों और आंतरिक असुरक्षा से संरक्षण की सख्त जरूरत थी।
विभीषण से विवाह करके मंदोदरी ने लंका की उन सभी बेसहारा स्त्रियों और बच्चों को राजसी संरक्षण प्रदान किया और रावण के कुल को पूरी तरह से समाप्त होने से बचा लिया। मंदोदरी का यह फैसला इतिहास में उनकी बुद्धिमानी और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
अस्वीकरण - इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य ज्योतिषीय मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। नईदुनिया इन दावों की पुष्टि नहीं करता और न ही अंधविश्वास का समर्थन करता है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।