
जब पांडव एक वर्ष के अज्ञातवास में राजा विराट के यहां अपना मूल वेश छिपाकर रहते थे तो उन दिनों कौरवों की सेना ने राजा विराट के राज्य में उन्हें लूटने के उद्देश्य से अचानक हमला कर दिया।
यह देख उनकी प्रजा काफी चिंतित हो गई। क्योंकि उस समय राजा विराट, राज्य से राजा बाहर गए हुए थे और राजमहल में 'राजकुमारी उत्तरा' और 'राजकुमार उत्तर' थे। हुआ यूं कि राजकुमार उत्तर को कौरवों से युद्ध करने के लिए मना लिया गया।
लेकिन उनके सामने समस्या थी कि उनका सारथी कौन बने जो रथ चलाने में श्रेष्ठ हो। तभी स्त्री रूप में मौजूद बृहन्नला (अर्जुन) ने कहा, 'राजकुमार में आपकी सारथी बनूंगी।' राजकुमार उत्तर जब नगर से युद्ध के लिए घर से निकले तो वह उत्साह से भरे हुए थे।
वो बार-बार बृहन्नला से कहते, 'रथ जल्दी चलाओं हमें दुर्याधन द्वारा हमारी गायों और पिता विराट की संपत्ति को मुक्त कराना है।' वह जल्द ही रणभूमि में पहुंचते हैं वहां कौरवों की विशाल सेना खड़ी हुई थी।
सेना के बड़े-बड़े वीर योद्धाओं को देखकर राजकुमार उत्तर घबरा गए। उन्होंने बृहन्नला से कहा, 'इतनी बड़ी सेना से में और मेरे कुछ सैनिक कैसे लड़ेंगे? मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है?' बृहन्नला( अर्जुन) हंस पड़ी वह बोली, 'उधर स्त्रियों के सामने तो आप काफी शेखी बघार रहे थे। नगर के लोग तुम्हारे भरोसे हैं राजकुमार।
सैरंध्री( द्रौपदी) ने ज़रा मेरी तारीफ क्या कर दी कि में रथ चलाने में निपुण हूं, और आप मुझे यहां युद्ध भूमि में ले आए। बिना लड़े यहां से भागना यानी अपनी हंसी करवाना होगा। तुम डटे रहो राजकुमार मैं तुम्हारे साथ हूं।'
रथ तेजी से कौरवों की सेना की ओर बढ़ चला। रथ कौरवों की सेना के बीच पहुंच चुका था। लेकिन राजकुमार ने लड़ने की इच्छा नहीं जताई वह रथ से उतरा और भागने लगा। बृहन्नल( अर्जुन) भी उसके पीछे भागने लगी। कौरव सेना के वीर यह देखकर काफी हंस रहे थे।
कौरवों की निगाह बृहन्नला(अर्जुन) पर थी। आचार्य द्रोण ने शक की निगाह से देखा और कहा, 'कौन हो सकता है ये पुरुष के वेश में स्त्री?' उनके इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कर्ण बोला, 'अर्जुन नहीं हो सकता और अगर है तो वो अकेला है, वो यहा से जिंदा नहीं जा सकेगा।'
इसी बीच बृहन्नला(अर्जुन) ने तेजी से दौड़ते राजकुमार को पकड़ लिया और फिर उसके समझाते हुए बृहन्नला (अर्जुन) ने कहा, 'तुम सिर्फ यह रथ संभालो में कौरवों से युद्ध करूंगी। तुम्हारी खोई हुई संपत्ति वापस आ जाएगी।'
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गुरु द्रोण समझ गए कि स्त्री के वेश में यह अर्जुन ही हैं उन्होंने यह बात इशारों में पितामाह भीष्म को बता दी। बहन्नला, राजकुमार के एक शमी वृक्ष के पास ले गईं।
वहां से उन्होंने दिव्य अस्त्र लिए। दिव्य अस्त्र देखकर राजकुमार ने कहा, 'ये शस्त्र तो पांडवों के हैं। तब बृहन्नला (अर्जुन) ने अपना परिचय दिया। उन्होंने अपने भाईयों और पत्नी के बारे में भी बताया।'
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यह सुनकर राजकुमार उत्तर ने कहा, 'मैं धन्य हो गया जो मुझे आप जैसे वीर का सानिध्य मिला। इसके बाद युद्ध हुआ, और अकेले अर्जुन ने सारी कौरव सेना को भागने पर मजबूर कर दिया।'