Holika Dahan Story: हर साल फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को भद्र रहित मुहूर्त में होलिका दहन होता है। इस वर्ष होलिका दहन 28 मार्च यानी रविवार को है। जिसका शुभ मुहूर्त शाम 6:37 मिनट से रात 8:56 मिनट तक हैं। इस दिन लोग अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने का प्रण लेते हैं। वहीं दूसरे दिन रंगों की होली खेलते हैं। होली तो हमें सालों से खेलते हैं आ रहे हैं, लेकिन कई हैं जिन्हें इससे मनाने के पीछे पौराणिक कथा के बारे में विस्तार से नहीं पता हैं। ऐसे में आज हम हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद से लेकर होलिका दहन की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं।

हिरण्यकशिपु को था ब्रह्मा से वरदान प्राप्त

विष्णुपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के प्रमुख कश्यप और उनकी पत्नी दिति के पुत्र थे हिरण्यकशिपु। उसने कठिन तपस्या कर ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया था। वहीं वरदान प्राप्त किया कि वह न किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा, न पशु द्वारा, नहीं दिन में मारा जा सकेगा और न रात्री में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र से वह मरेगा। इस वरदान ने हरिण्यकशिपु को अहंकारी बना दिया। वह खुद को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य तक छीन लिया और तीनों लोकों को परेशान करने लगा। वह खुद को भगवान समझने लगा था और चाहता था कि सब लोग उसकी पूजा करें।

राज्य में विष्णु पूजा को वर्जित कर दिया

विष्णुपुराण के अनुसार वर्तमान में झांसी जिले का एक एरच कस्बा सतयुग में एरिकच्छ के नाम से जाना जाता था। एरिकच्छ हिरण्यकशिपु की राजधानी थी। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया था। लेकिन इस दैत्यराज के घर जन्म हुआ प्रह्लाद का। प्रह्लाद विष्णु का भक्त था और उनकी पूजा करता था। प्रह्लाद की नारायण भक्ति से परेशान होकर हिरण्यकशिपु ने उसे मरवाने के कई प्रयास किया, फिर भी वह बच गया। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को डिकोली पर्वत से नीचे फिंकवा दिया। डिकोली पर्वत का वह स्थान जिस पर प्रह्लाद गिरा वह आज भी मौजूद है। इसका जिक्र श्रीमद्धागवत पुराण के 9वें स्कन्ध में और झांसी गजेटियर पेज 339 से 357 में मिलता हैं।

होलिका के पास थी चुनरी

प्रह्लाद की भक्ति से परेशान हिरण्यकशिपु ने बेटे को मारने के लिए बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका के पास एक चुनरी थी, जिसे पहनने पर वह आग के बीच बैठ सकती थी। उसे भी वरदान था ओढ़नी पर आग का कोई असर नहीं होता था। नाराज हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्जवलित आग में बैठ जाएं। होलिका वही चुनरी ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। भगवान की माया का असर हुआ कि हवा चली और चुनरी होलिका के ऊपर से उड़कर प्रह्लाद पर आ गई। इस तरह प्रह्लाद का कुछ भी नहीं हुआ और होलिका जलकर राख हो गई।

नरसिंह अवतार ने किया वध

आखिरी में हिरण्यकशिपु ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल किया और बेटे को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को बचाने आ गए। वे खंभे से नरसिंह के रूप से प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर लेकर आए। जो न घर के बाहर था न अंदर, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु। नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज नाखूनों से जो न अस्त थे न शस्त्र से उसे मार डाला। इस प्रकार हिरण्यकशिपु अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्ट कर्मों का अंत हुआ।

Posted By: Arvind Dubey

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