
एक बार एक साधक ने कन्फ्यूशियस से पूछा, मैं मन पर संयम कैसे रखूं? कन्फ्यूशियस ने उस व्यक्ति से पूछा, क्या तुम कानों से सुनते हो? साधक ने कहा, हां, मैं कानों से ही सुनता हूं।
तब कन्फ्यूशियस ने कहा, मैं नहीं मान सकता तुम मन से भी सुनते हो और उसे सुनकर अशांत हो जाते हो। इसलिए आज से केवल कानों से सुनो।
मन से सुनना बंद कर दो। तुम आंखों से देखते हो, यह भी मैं मान नहीं सकता आज से तुम केवल आंख से देखना और जीभ से चखना आरंभ करो। मन पर अपने आप संयम हो जाएगा।
संक्षेप में
यह प्रेरक प्रसंग एक सशक्त सूत्र की तरह है। केवल कान से सुनो, आंख से देखो और जीभ से चखो। उनसे मन को मत जोड़ो। मन पर संयम रखने की यह पहली सीढ़ी है।