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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 03, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

संत रैदास की ये 11 साखियां बदल सकती हैं आपकी जिंदगी

मनुष्य को जन्म की जाति भुलाकर कर्म की जाति पर ध्यान देना चाहिए, वेदों का असली धर्म है।

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Publish Date: Wed, 03 Jun 2015 03:41:32 PM (IST)Updated Date: Thu, 11 Jun 2015 05:08:48 PM (IST)
संत रैदास की ये 11 साखियां बदल सकती हैं आपकी जिंदगी

संत कवि रैदास का जन्म काशी में चर्मकार कुल में हुआ था। इन्हें संत रविदास के नाम से भी जाना जाता है। उनके गुरु का नाम स्वामी रामानंद था। वे संत कबीर के गुरुभाई थे। संत रैदास उन महान संतों में से एक हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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रैदास की साखियां

  1. रविदास जी कहते हैं, हम सभी एक बूंद से पैदा हुए हैं। हम सभी समान है। इसलिए किसी को भी छोटा-बड़ा नहीं मानना चाहिए।
  2. प्रत्येक मनुष्य को मेहनत की कमाई खानी चाहिए। जो कोई नेक कमाई करता है। उसकी कमाई कभी भी निष्फल नहीं जाती।
  3. मनुष्य को अपने जन्म की जाति को भुलाकर कर्म की जाति पर ध्यान देना चाहिए, यही वेदों का असली धर्म है।
  4. न तो कोई जाति निम्न होती है और न ही कोई गांव निम्न। रविदास कहते हैं की निम्न वो है जो दुख देने वाले कर्म करता है।
  5. सभी स्वयं को बड़ा मानते हैं, कोई भी छोटा नहीं बनना चाहता। जबकि नदी नीचे बहती हैं। पेड़ फल लगने के बाद झुक जाते हैं। भाव यह है कि विनम्रता ही भक्ति की सच्ची पराकाष्ठा है।
  6. जाति व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए रविदास कहते हैं कि, जैसे केले के पत्तों में भी पत्ते होते हैं, उसी तरह बिरादरी में भी बिरादरियां छिपी होती हैं। जब तक ये जाति का चक्कर नहीं मिटता तब तक मनुष्य एक नहीं हो पाएगा।

  • इस जाति के जाल ने सभी को उलझा रखा है। यह जाति का रोग धीरे-धीरे मानवता को खा रहा है। इस रोग को मिटाने से ही मानव का कल्याण हो सकता है।
  • वेद पुराण आदि शास्त्रों में वर्णित वचनों को सुनकर मन में शंका उत्पन्न होती है। उनका समाधान कौन दूर कर सकता है।
  • ऐसे धर्म स्थल में शीश क्या झुकाना, जहां भेद पैदा करने वाले हों। शीश तो वहीं झुकाना चाहिए, जहां प्रभु हों यानी शीश कहीं भी नवा सकते हैं।
  • संत रविदास सांप्रदायिकता पर कहते हैं कि एक खुदा का घर पश्चिम में मानता है और दूसरा कहता है कि ईश्वर पूर्व में है। मैं तो उस ईश्वर की आराधना करता हूं। जो किसी स्थान विशेष में नहीं रहते व जिन्हें किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है।
  • संत रैदास कहते हैं कि मदिरा पान करने से चित्त विचलित हो जाता है तथा नशा उतरने पर ग्लानि होती है। मनुष्य को राम नाम रूपी महारस पीना चाहिए। यदि वह चेतना में समा जाए तो आजीवन नहीं उतरता।
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