क्या आपके पूर्वज थे गृहस्थ या वानप्रस्थी? तो जानिए दशमी तिथि पर तर्पण करने का सही नियम, पितृ दोष से मिलेगी मुक्ति!
पितृ पक्ष की दशमी तिथि पर उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन किसी भी माह की दशमी तिथि को हुआ हो या जो गृहस्थ जीवन व्यतीत कर चुके हों। श्र...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 05 Oct 2026 10:56:30 AM (IST)Updated Date: Mon, 05 Oct 2026 10:56:30 AM (IST)
आज दशमी तिथि का श्राद्ध। (एआई जनरेटेड)HighLights
- 5 अक्टूबर को है दशमी तिथि का श्राद्ध
- कुतुप और रौहिण इसका शुभ मुहूर्त होगा
धर्म डेस्क। भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ हुए पितृ पक्ष (महालय श्राद्ध) की पावन श्रृंखला में आज 5 अक्टूबर 2026, सोमवार को दशमी तिथि का श्राद्ध संपन्न किया जा रहा है। सनातन धर्म में मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में पृथ्वी लोक पर पधारते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए तर्पण, जल और अन्न को ग्रहण कर उन्हें सुख, समृद्धि और वंश-वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
आइए जानते हैं आज दशमी तिथि के श्राद्ध का सटीक मुहूर्त, यह किन पूर्वजों के लिए किया जाता है और श्राद्ध कर्म से जुड़े प्रमुख नियम क्या हैं-
आज दशमी श्राद्ध 2026 के शुभ मुहूर्त
पंचांगीय गणना के अनुसार, आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि का समय और श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त निम्नलिखित हैं-
- दशमी तिथि का प्रारंभ: 5 अक्टूबर 2026 को भोर में 03:53 बजे से।
- दशमी तिथि का समापन: 6 अक्टूबर 2026 को तड़के 02:07 बजे तक।
- कुतुप मुहूर्त (श्रेष्ठ पूजन समय): सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक।
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से दोपहर 01:20 बजे तक।
- अपराह्न काल: दोपहर 01:20 बजे से 03:40 बजे तक।
(नोट: शास्त्रों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त को सबसे उत्तम माना गया है।)
दशमी तिथि पर किसका श्राद्ध किया जाता है?
शास्त्रों और पंचांगीय विधान के अनुसार, दशमी तिथि का श्राद्ध विशेष रूप से निम्नलिखित पूर्वजों को समर्पित होता है-
- मृत्यु तिथि के अनुसार: परिवार के उन दिवंगत सदस्यों के लिए, जिनका निधन किसी भी माह (शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष) की दशमी तिथि को हुआ हो।
- गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम के पितृ: दशमी श्राद्ध उन पितरों के लिए विशेष माना जाता है जो पूर्ण गृहस्थ जीवन व्यतीत कर चुके हों तथा वंश परंपरा को आगे बढ़ा चुके हों। शास्त्रों में वानप्रस्थ आश्रम के अनुयायियों का श्राद्ध भी दशमी तिथि पर करना सर्वोत्तम बताया गया है।
चारों पुरुषार्थों की सिद्धि: मान्यता है कि दशमी तिथि पर श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध अनुष्ठान धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायक होता है। (यदि किसी को अपने पूर्वज की सटीक मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो उनका श्राद्ध पितृ पक्ष के अंतिम दिन यानी सर्वपितृ अमावस्या पर किया जाता है।)
श्राद्ध कर्म के दौरान रखें इन मुख्य नियमों का ध्यान
- सात्विक भोजन व शुद्धता: श्राद्ध का भोजन पूर्ण सात्विकता और पवित्रता के साथ बनाएं। भोजन में लहसुन, प्याज या किसी भी तामसिक सामग्री का प्रयोग बिल्कुल न करें।
- पंचबलि भोग का विधान: भोजन तैयार होने के बाद सबसे पहले पंचबलि भोग निकालें। यह भोग 5 जीवों के लिए निकाला जाता है- गौ माता (गाय), कौआ, कुत्ता, चींटी और देव।
- दिशा का नियम: तर्पण, अर्घ्य और पिंडदान करते समय अपना मुख सदैव दक्षिण दिशा (पितरों की दिशा) की ओर रखें।
- ब्राह्मण भोजन व दान-दक्षिणा: श्राद्ध पूजन संपन्न होने के पश्चात आदरपूर्वक ब्राह्मणों को सात्विक भोजन कराएं और अपनी सामर्थ्य अनुसार वस्त्र व दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
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