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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 11, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Premanand Maharaj Ji: क्या पीने से नहीं होती अकाल मृत्यु, प्रेमानंद महाराज ने बताया रहस्य

भगवान को चढ़ाए जाने वाले जल को चरणामृत कहा जाता है। इसमें तुलसी के पत्ते मिलाने के बाद इसे ग्रहण किया जाता है। हिंदू धर्म में चरणामृत का विशेष महत्‍व ...और पढ़ें

By Bharat MandhanyaEdited By: Bharat Mandhanya
Publish Date: Sun, 11 Aug 2024 02:00:20 PM (IST)Updated Date: Mon, 12 Aug 2024 07:32:28 AM (IST)
Premanand Maharaj Ji: क्या पीने से नहीं होती अकाल मृत्यु, प्रेमानंद महाराज ने बताया रहस्य
भगवान के चरणों के जल को चरणमृत कहा जाता है।

HighLights

  1. पूजा के बाद ग्रहण किया जाता है चरणामृत
  2. चरणामृत को तांबे के पात्र में रखा जाता है
  3. चरणामृत में मौजूद होते हैं औषधीय गुण

धर्म डेस्क, इंदौर (Premanand Maharaj Ji)। हिंदू धर्म में चरणामृत को पवित्र माना जाता है। जिस जल से देवताओं का अभिषेक किया जाता है, उसे बाद में चरणामृत के रूप में ग्रहण किया जाता है। तांबे के पात्र में भगवान के चरणों के जल को लेकर उसमें तुलसी का पत्ता मिलाया जाता है और इसके वितरित किया जाता है।

हिंदू ग्रंथों में चरणामृत का उल्लेख किया गया है। प्रसिद्ध कथावाचक प्रेमानंद महाराज ने भी अपने प्रवचन में चरणामृत का महत्व बताया है और इसके चमत्कारिक फायदे बताए हैं।

नहीं होता पुनर्जन्म

प्रेमानंद महाराज ने कथा के दौरान बताया कि जो रोज चरणामृत पीता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यानी उसे जन्‍म-मृत्‍यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। अगर किसी को कोई रोग है तो चरणामृत पीने से यह पीड़ा नहीं पहुंचाता।


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अकाल मृत्यु नहीं होगी

प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि चरणामृत पीने से अकाल मृत्यु नहीं होती। इसमें बहुत बड़ा सामर्थ्‍य है। चरणामृत पीने वालों को कोई रोग भी परास्त नहीं कर सकता है।

मंत्र में बताया महत्व

हिंदू शास्त्रों में कुछ मंत्रों के माध्यम से भी चरणामृत का महत्व बताया गया है। इसमें कहा गया है कि चरणामृत पीने वालों को अकाल मृत्‍यु नहीं आती है।

अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम्

श्री कृष्ण पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।

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औषधि के समान है चरणामृत?

भगवान के चरणों का जल ही चरणामृत कहलाता है। शास्त्रों में चरणामृत को औषधि के समान बताया गया है। इसे बनाने के लिए एक तांबे के पात्र में भगवान के चरणों के जल को लेकर उसमें तुलसी का पत्ता और तिल मिलाए जाते है। तांबे और तुलसी के औषधीय गुण जल में आने से वह फायदेमंद हो जाता है।

डिसक्लेमर

'इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।'