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पितृ पक्ष में लोग क्यों जाते हैं काशी के पिशाच मोचन तीर्थ, जहां पीपल के पेड़ पर टंगी रहती हैं मृतकों की तस्वीरें?

धर्म नगरी काशी स्थित पिशाच मोचन कुंड के पास एक प्राचीन पीपल का वृक्ष है, जहां अकाल मृत्यु को प्राप्त अतृप्त आत्माओं की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Akriti kumari
Publish Date: Mon, 05 Oct 2026 04:23:50 PM (IST)Updated Date: Mon, 05 Oct 2026 04:23:50 PM (IST)
पितृ पक्ष में लोग क्यों जाते हैं काशी के पिशाच मोचन तीर्थ, जहां पीपल के पेड़ पर टंगी रहती हैं मृतकों की तस्वीरें?
पिशाच मोचन कुंड पर प्राचीन पीपल।

धर्म डेस्क। धर्मनगरी काशी (वाराणसी) विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक है, जिसे मोक्षदायिनी नगरी माना जाता है। काशी में अलौकिक और रहस्यमयी तीर्थों की कोई कमी नहीं है, लेकिन इनमें से 'पिशाच मोचन तीर्थ' की मान्यता सबसे अलग और अनूठी है।

पिशाच मोचन कुंड के समीप स्थित एक सैकड़ों साल पुराना विशाल पीपल का वृक्ष श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच कौतूहल एवं विस्मय का केंद्र बना रहता है। इस वृक्ष के विभिन्न तनों पर सैकड़ों कीलें, सिक्के और दिवंगत व्यक्तियों की तस्वीरें गड़ी और लटकी हुई नजर आती हैं। आइए जानते हैं इस प्राचीन वृक्ष, अकाल मृत्यु से मुक्ति के विधान और इसके पौराणिक इतिहास के बारे में।


पीपल के पेड़ पर क्यों ठोकी जाती हैं तस्वीरें और कीलें?

सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु (दुर्घटना, बीमारी या असमय मृत्यु) होती है, तो उसकी आत्मा अतृप्त रहकर प्रेत योनि में प्रवेश कर जाती है। ऐसी भटकती आत्माएं प्रायः परिजनों को परेशान करती हैं या शांति की राह देखती हैं।

  • त्रिपिंडी श्राद्ध और नारायण बलि: परिजनों द्वारा ऐसी अतृप्त आत्माओं की शांति और मुक्ति के लिए पिशाच मोचन कुंड पर विशेष 'त्रिपिंडी श्राद्ध' और 'नारायण बलि' का अनुष्ठान कराया जाता है।
  • आत्मा को 'बैठाने' की विधि: इस विशेष अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद गुप्त रूप से दिवंगत व्यक्ति की तस्वीर को लोहे की कील और सिक्के के सहारे इसी विशाल पीपल के वृक्ष के तने में गाड़ दिया जाता है।

  • मुक्ति का मार्ग: धार्मिक मान्यता है कि इस उपाय से वह भटकती आत्मा पीपल के पेड़ पर 'बैठ' (शांत हो) जाती है, उसका उपद्रव समाप्त होता है और उसके लिए सद्गति व मोक्ष का मार्ग खुल जाता है।
  • पितृपक्ष में उमड़ती है देश भर से श्रद्धालुओं की भीड़

    पिशाच मोचन तीर्थ के पुरोहित के अनुसार-

    • सदियों पुरानी परंपरा है कि गयाजी (बिहार) जाकर पिंडदान करने से पूर्व श्रद्धालु काशी के पिशाच मोचन कुंड पर आकर अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं।
    • पितृपक्ष के दौरान पूर्वांचल के साथ-साथ बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य राज्यों से हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पहुंचते हैं।
    • ऐसी मान्यता है कि जिन व्यक्तियों पर प्रेत बाधा या नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव होता है, वे यदि पिशाच मोचन कुंड में स्नान कर तर्पण करते हैं, तो उन्हें इन समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है।

    गंगा अवतरण से भी प्राचीन है पिशाच मोचन कुंड

    धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भारतीय संस्कृति में मोक्ष प्रदान करने वाली सात पुरियों (अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांजीवरम, उज्जैन और द्वारका) का वर्णन है। परंतु अकाल मृत्यु से मरे व्यक्तियों की मुक्ति के लिए काशी का पिशाच मोचन तीर्थ ही सर्वोच्च स्थान माना गया है।

    इस कुंड का इतिहास मां गंगा के धरती पर अवतरण से भी पूर्व का माना जाता है। स्कंद पुराण और काशी खंड में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। इस तीर्थ की स्थापना महादेव के परम भक्त कपर्दी ने की थी। उन्होंने यहां एक पावन शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे 'कपर्दीश्वर महादेव' कहा जाता है। मान्यता है कि कपर्दीश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही भूत-प्रेत और पितृ बाधा से जुड़ी सभी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।

    (नोट: यह रिपोर्ट काशी के पिशाच मोचन तीर्थ की स्थानीय परंपराओं, तीर्थ पुरोहितों के वक्तव्य, स्कंद पुराण और सनातन धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों पर आधारित है।)