
धर्म डेस्क। धर्मनगरी काशी (वाराणसी) विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक है, जिसे मोक्षदायिनी नगरी माना जाता है। काशी में अलौकिक और रहस्यमयी तीर्थों की कोई कमी नहीं है, लेकिन इनमें से 'पिशाच मोचन तीर्थ' की मान्यता सबसे अलग और अनूठी है।
पिशाच मोचन कुंड के समीप स्थित एक सैकड़ों साल पुराना विशाल पीपल का वृक्ष श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच कौतूहल एवं विस्मय का केंद्र बना रहता है। इस वृक्ष के विभिन्न तनों पर सैकड़ों कीलें, सिक्के और दिवंगत व्यक्तियों की तस्वीरें गड़ी और लटकी हुई नजर आती हैं। आइए जानते हैं इस प्राचीन वृक्ष, अकाल मृत्यु से मुक्ति के विधान और इसके पौराणिक इतिहास के बारे में।
सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु (दुर्घटना, बीमारी या असमय मृत्यु) होती है, तो उसकी आत्मा अतृप्त रहकर प्रेत योनि में प्रवेश कर जाती है। ऐसी भटकती आत्माएं प्रायः परिजनों को परेशान करती हैं या शांति की राह देखती हैं।
पिशाच मोचन तीर्थ के पुरोहित के अनुसार-
धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भारतीय संस्कृति में मोक्ष प्रदान करने वाली सात पुरियों (अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांजीवरम, उज्जैन और द्वारका) का वर्णन है। परंतु अकाल मृत्यु से मरे व्यक्तियों की मुक्ति के लिए काशी का पिशाच मोचन तीर्थ ही सर्वोच्च स्थान माना गया है।
इस कुंड का इतिहास मां गंगा के धरती पर अवतरण से भी पूर्व का माना जाता है। स्कंद पुराण और काशी खंड में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। इस तीर्थ की स्थापना महादेव के परम भक्त कपर्दी ने की थी। उन्होंने यहां एक पावन शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे 'कपर्दीश्वर महादेव' कहा जाता है। मान्यता है कि कपर्दीश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही भूत-प्रेत और पितृ बाधा से जुड़ी सभी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।
(नोट: यह रिपोर्ट काशी के पिशाच मोचन तीर्थ की स्थानीय परंपराओं, तीर्थ पुरोहितों के वक्तव्य, स्कंद पुराण और सनातन धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों पर आधारित है।)