
धर्म डेस्क। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ महिलाएं रविवार, 1 नवंबर को अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं अहोई माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर संतान के सुखी और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। व्रत में दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को तारों के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य देने की परंपरा है।
ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा ने बताया कि अहोई अष्टमी का व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु और खुशहाल जीवन के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान व्रत कथा सुनने और आरती करने का विधान है। इसके बाद आकाश में तारे दिखाई देने पर उन्हें जल अर्पित कर संतान की मंगलकामना की जाती है।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर को दोपहर दो बजकर 51 मिनिट से शुरू होगी और इसका समापन दो नवंबर को दोपहर एक बजक 10 मिनिट पर होगा। उदय तिथि के बजाय तारों के दर्शन की परंपरा को ध्यान में रखते हुए अहोई अष्टमी का व्रत एक नवंबर को रखा जाएगा। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम पांच बजकर 36 मिनिट से छह बजकर 54 मिनिट तक रहेगा। वहीं, तारों के दर्शन का समय शाम करीब छह बजे बताया गया है।
इस बार अहोई अष्टमी पर पुष्य नक्षत्र का संयोग बन रहा है। साथ ही चंद्रमा कर्क राशि में रहेगा। ज्योतिष शास्त्र में पुष्य नक्षत्र को शुभ और मंगलकारी माना गया है। इस संयोग में महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि के लिए अहोई माता का पूजन करेंगी।