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मंदसौर में स्थापित हैं अद्भुत द्विमुखी गणेशजी, एक ही मूर्ति में दो रूपों की अलग-अलग विधि से होती है पूजा

मंदसौर की पहचान श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से है, लेकिन शहर की घनी बस्ती जनकूपुरा स्थित गणपति चौक में विराजित श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति मंदिर भी आ...और पढ़ें

By Alok SharmaEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sun, 13 Sep 2026 04:07:58 PM (IST)Updated Date: Sun, 13 Sep 2026 04:07:58 PM (IST)
मंदसौर में स्थापित हैं अद्भुत द्विमुखी गणेशजी, एक ही मूर्ति में दो रूपों की अलग-अलग विधि से होती है पूजा
मंदसौर के गणपति चौक पर स्थित श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. स्वप्न में नाहर सैय्यद तालाब के पास प्रतिमा होने का आभास हुआ
  2. मौके पर पहुंचने पर पत्थरों में दबी मूर्ति दिखाई दी
  3. श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति मंदिर आस्था का अनूठा केंद्र है

नईदुनिया प्रतिनिधि, मंदसौर । मंदसौर की पहचान श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से है, लेकिन शहर की घनी बस्ती जनकूपुरा स्थित गणपति चौक में विराजित श्री द्विमुखी चिंताहरण गणपति मंदिर भी आस्था का अनूठा केंद्र है।

यहां भगवान गणेश की करीब सात फीट ऊंची खड़ी मुद्रा वाली प्रतिमा के दो स्वरूप हैं। आगे पांच सुंड वाले पंचसुंडी गणेश और पीछे पगड़ी पहने श्रेष्ठी यानी सेठजी के रूप में भगवान गणेश विराजमान हैं। प्रतिमा का कलात्मक स्वरूप श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

स्वप्न में मिले संकेत, तालाब से निकली प्रतिमा

मंदिर के ज्ञात इतिहास के अनुसार करीब 90 वर्ष पहले शहर निवासी मूलचंद स्वर्णकार को स्वप्न में नाहर सैय्यद तालाब के पास प्रतिमा होने का आभास हुआ। मौके पर पहुंचने पर पत्थरों में दबी मूर्ति दिखाई दी। संवत 1986 में आषाढ़ सुदी पंचमी, 22 जून 1929 को प्रतिमा की स्थापना का प्रेरणात्मक आदेश मिलने के बाद इसे विधि-विधान से निकाला गया।


जहां रुकी बैलगाड़ी, वहीं बना मंदिर

बुजुर्गों के अनुसार प्रतिमा को नरसिंहपुरा ले जाया जा रहा था, लेकिन जनकूपुरा के वर्तमान गणपति चौक पर बैलगाड़ी आगे नहीं बढ़ी। इसे भगवान की इच्छा मानकर यहीं स्थापना की गई। तभी से यह स्थान गणपति चौक के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

पंचसुंडी और सेठजी स्वरूप की मान्यता

आगे के पांच सुंड वाले स्वरूप को पंचतत्वों से जुड़ा विघ्नहर्ता और पीछे दाहिनी सुंड वाले स्वरूप को संकटमोचन गणेश माना जाता है। दोनों तरफ पूजा के विधान भी अलग हैं। प्रति बुधवार शाम महाआरती होती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां दर्शन और पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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