अन्नकूट और गोवर्धन पूजा: प्रकृति, गोवंश और अटूट आस्था का महापर्व
द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को देवराज इंद्र के अहंकार के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था। देश के विभिन्न हिस्सों में गोवर्धन पूजा की परंपरा आज भी अपनी पूरी पारंपरिक भव्यता के साथ निभाई जाती है।
Publish Date: Sat, 07 Nov 2026 12:43:53 PM (IST)Updated Date: Sat, 07 Nov 2026 12:48:40 PM (IST)
गोवर्धन पूजा।HighLights
- घरों के बाहर, आंगनों में गोबर से गोवर्धन की प्रतिमा बनाई जाती है।
- गोवर्धन जी, ग्वाल-बाल, पेड़-पौधे और पानी कुंड उकेरा जाता है।
- मंदिरों और घरों में भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।
धर्म डेस्क। दिवाली के ठीक अगले दिन मनाए जाने वाला गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और जीव-मात्र के प्रति हमारी कृतज्ञता का जीवंत दस्तावेज है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को देवराज इंद्र के अहंकार के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि हम अपनी रक्षा करने वाले गोवर्धन पर्वत, प्रकृति और गोवंश (गायों) की पूजा करते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में गोवर्धन पूजा की परंपरा आज भी अपनी पूरी पारंपरिक भव्यता के साथ निभाई जाती है।
ब्रज क्षेत्र में गोवर्धन पर्वत की 21 किलोमीटर की परिक्रमा लगाने का विशेष महत्व है। इस दिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु मुकुट मुखरविन्द के दर्शन कर गोवर्धन महाराज की परिक्रमा करते हैं। ठीक वैसा ही प्रतीकात्मक पहाड़ हमारे यहां बनाया जाता है और पूजा की जाती है।
घरों के बाहर और आंगनों में गोबर से गोवर्धन भगवान की लेपनयुक्त कलात्मक प्रतिमा बनाई जाती है, जिसमें लेटे हुए गोवर्धन जी, ग्वाल-बाल, पेड़-पौधे और पानी के कुंड को बेहद खूबसूरती से उकेरा जाता है। मंदिरों और घरों में भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है, जिसमें विभिन्न प्रकार की सब्जियां, कढ़ी-चावल, बाजरा, पूरी और मौसमी फल शामिल होते हैं।
गोवर्धन पूजा की मुख्य परंपराएं और अनुष्ठान
- इस दिन गायों को स्नान कराकर उन्हें हल्दी, कुमकुम और मेंहदी से सजाया जाता है। उनके गले में नए घुंघरू और फूलों की माला पहनाई जाती है।
- मान्यता है कि गायों में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है, इसलिए उनकी पूजा से समस्त ब्रह्मांड की पूजा का फल मिलता है।
- गोवर्धन की पूजा के बाद उसकी सात बार परिक्रमा की जाती है और हाथ में जौ (या हरा चारा) लेकर गोवर्धन जी की परिक्रमा करते हुए जयकारे लगाए जाते हैं।
- इसके बाद शाम को सभी मिलकर अन्नकूट का प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमारी आजीविका और जीवन का आधार प्रत्यक्ष रूप से प्रकृति और जीव हैं।
- गोवर्धन पर्वत उस पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतीक है जो हमें जल, वनस्पति और शुद्ध वायु प्रदान करता है।
आधुनिकता के दौर में भी जीवंत है हमारी संस्कृति
- भागदौड़ भरी जिंदगी और आधुनिकता के इस दौर में भी गोवर्धन पूजा का यह पर्व गांवों से लेकर महानगरों तक उतनी ही श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
- यह त्योहार हमें अपनी जड़ों से जुड़ने, पशुधन का सम्मान करने और मिल-जुलकर उत्सव मनाने की प्रेरणा देता है।
- गोवर्धन पूजा हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति का संरक्षण ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
- आइए, इस पावन पर्व पर हम सब मिलकर प्रकृति और गोवंश की रक्षा का संकल्प लें।