
नईदुनिया न्यूज, बदनावर (धार) : करीब 101 वर्ष पहले एक भक्त को स्वप्न में भगवान गणेश के दर्शन हुए। स्वप्न में भगवान ने एक स्थान पर खोदाई करने के संकेत दिए। परिवार ने इसे महज सपना नहीं, भगवान का आदेश माना और बताए गए स्थान पर खोदाई शुरू कराई। यहां जमीन के भीतर से गणेशजी की मूर्ति प्रकट हुई।
विधि-विधान से पूजन के बाद मूर्ति को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया गया। आज यही स्थान मालीपुरा स्थित चिंतामण गणेश मंदिर के रूप में बदनावर की आस्था का प्रमुख केंद्र है। भक्त इस मूर्ति को स्वयंभू स्वरूप मानते हैं।
पं. श्याम सिद्ध के अनुसार यह स्वप्न उनके परदादा बंशीधर सिद्ध को आया था। खोदाई में मूर्ति मिलने के बाद उसे भगवान का आशीर्वाद मानकर वहीं स्थापित किया गया। पुराने किले के समीप कभी शांत और सुनसान रहने वाला यह स्थान समय के साथ मंदिर परिसर में विकसित होता गया।
चिंतामण गणेश मंदिर की एक अनूठी परंपरा करीब 15 वर्षों से चली आ रही है। यहां भगवान को सजीव स्वरूप मानकर रात में उनके लिए बकायदा पलंग लगाया जाता है। गादी, रजाई और तीन तकिए रखे जाते हैं। इसके बाद मंदिर के पट बंद कर ताला लगा दिया जाता है।
सुबह मंदिर खुलने पर सबसे पहले बिस्तर हटाया जाता है। बताया जाता है कि गांव खेड़ा के बुजुर्ग राजाराम पाटीदार को स्वप्न आने के बाद यह परंपरा शुरू हुई थी। तब से श्रद्धालु इसे भगवान के रात्रि विश्राम की परंपरा के रूप में निभा रहे हैं।
भक्तों की मान्यता है कि चिंतामण गणेश के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। ‘चिंतामण’ यानी चिंताओं को हरने वाला। तब एक भक्त ने स्वप्न में संकेत देखा था। आज हजारों भक्त जागती आंखों से उसी भगवान में अपनी उम्मीद देखते हैं।
शायद यही कारण है कि बदनावर में चिंतामण गणेश के दरबार को लेकर एक विश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम है। विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्यों की पहली निमंत्रण पत्रिका भी कई परिवार सबसे पहले भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं। संकट या नई शुरुआत के समय भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपनी मनोकामना रखते हैं।
समय के साथ मंदिर का स्वरूप भी बदलता गया। वर्ष 2011 में मंदिर परिसर में माता रिद्धि-सिद्धि की मूर्तियों की स्थापना धूमधाम से की गई। इसके बाद वर्ष 2012 में इंदौर के प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर के मुख्य पुजारी भालचंद्र भट्ट यहां पहुंचे और भगवान गणेश का मोतियों से विशेष अभिषेक किया।
गणेशोत्सव के दौरान मंदिर में मेले जैसा माहौल रहता है। भगवान का प्रतिदिन आकर्षक श्रृंगार किया जाता है तथा सुबह-शाम मंगल आरती होती है। पुराने किले के समीप स्थित यह मंदिर अब बदनावर की धार्मिक पहचान से जुड़ चुका है।
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