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बस्‍तर दशहरा: 75 दिन तक चलने वाले अनूठे पर्व में मां दंतेश्वरी की आराधना के साथ निभाई जा रहीं आदिवासी परंपराएं

लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में रावण दहन नहीं होता, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और पारंपरिक पूजा विधान के माध्यम से उत्सव मनाया जाता है। इस व...और पढ़ें

By Animesh PaulEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Tue, 20 Oct 2026 11:20:04 AM (IST)Updated Date: Tue, 20 Oct 2026 11:40:30 AM (IST)
बस्‍तर दशहरा: 75 दिन तक चलने वाले अनूठे पर्व में मां दंतेश्वरी की आराधना के साथ निभाई जा रहीं आदिवासी परंपराएं
मां दंतेश्वरी मंदिर के सामने खड़ा फूल रथ और आकर्षक रोशनी से सजा मंदिर परिसर। बस्‍तर का राजमहल।

HighLights

  1. बस्तर दशहरा: पाट जात्रा से निशा जात्रा तक पूरी हुईं प्रमुख रस्में, अब मावली परघाव की बारी
  2. 20 अक्टूबर को मावली परघाव, भीतर रैनी और बाहर रैनी के साथ आगे बढ़ेगा उत्सव
  3. पर्व की शुरुआत पाट जात्रा से हुई। इस रस्म में रथ निर्माण के लिए लकड़ी की पूजा की जाती है।

नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा पर्व अपनी अनूठी परंपराओं और आदिवासी संस्कृति के लिए देश-दुनिया में पहचान रखता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में रावण दहन नहीं होता, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और पारंपरिक पूजा विधान के माध्यम से उत्सव मनाया जाता है। इस वर्ष 12 अगस्त को पाट जात्रा के साथ शुरू हुए पर्व में 19 अक्टूबर तक कई महत्वपूर्ण रस्में पूरी हो चुकी हैं। अब उत्सव अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है।

पर्व की शुरुआत पाट जात्रा से हुई। इस रस्म में रथ निर्माण के लिए लकड़ी की पूजा की जाती है। इसके बाद डेरी गड़ाई के साथ रथ निर्माण की परंपरा आगे बढ़ी। 10 अक्टूबर को काछनगादी की रस्म निभाई गई। इसके बाद कलश स्थापना और जोगी बिठाई के साथ पर्व के अगले चरण की शुरुआत हुई। नवरात्रि के दौरान मां दंतेश्वरी की आराधना और रथ परिक्रमा ने उत्सव को गति दी। 18 अक्टूबर को बेल पूजा की रस्म भी निभाई गई।


19 अक्टूबर को महाअष्टमी पूजा विधान के साथ निशा जात्रा की रस्म निर्धारित है। इन अनुष्ठानों के बाद 20 अक्टूबर को कुंवारी पूजा, जोगी उठाई और मावली परघाव का आयोजन होगा। मावली परघाव में मां दंतेश्वरी की डोली और मावली माता के आगमन से जुड़ी परंपरा निभाई जाती है। यह बस्तर दशहरा के सबसे महत्वपूर्ण आयोजनों में शामिल है।

इसके बाद 21 अक्टूबर को भीतर रैनी और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी के तहत रथ परिक्रमा होगी। 23 अक्टूबर को काछन जात्रा और मुरिया दरबार का आयोजन प्रस्तावित है। 24 अक्टूबर को कुटुंब जात्रा के साथ ग्राम देवी-देवताओं की विदाई होगी। 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई के साथ पर्व का औपचारिक समापन होगा।

करीब छह शताब्दी पुरानी परंपरा से जुड़े इस उत्सव में बस्तर के विभिन्न गांवों के मांझी, चालकी, पुजारी, गायता और सेवादार अपनी भूमिका निभाते हैं। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामूहिक आस्था, जनजातीय संस्कृति और परंपरागत सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक भी है।