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बस्तर दशहरा विशेष: ढाक की थाप से काष्ठ शिल्प तक, मूर्तिलाइन में बंगाल और बस्तर का संगम

1947 के विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल, जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहलाया, से भारत आने वाले परिवारों का सिलसिला कई दशकों तक चला। सांप्रदायिक तनाव और असुर...और पढ़ें

By Animesh PaulEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Tue, 20 Oct 2026 10:52:21 AM (IST)Updated Date: Tue, 20 Oct 2026 10:57:45 AM (IST)
बस्तर दशहरा विशेष: ढाक की थाप से काष्ठ शिल्प तक, मूर्तिलाइन में बंगाल और बस्तर का संगम
धनंजय बारोई अपनी दुकान में बस्तर में काष्ठ शिल्प की परंपरा को आगे बढ़ा रहे तीसरी पीढ़ी के भतीजे शंकर के साथ। यह क्षेत्र की शुरुआती दुकानों में से एक है, जहां बंगाल से आया शिल्प कौशल बस्तर की संस्कृति से जुड़कर नई पहचान बना।

HighLights

  1. दंडकारण्य पहुंचे परिवारों ने दुर्गोत्सव में सहेजी अपनी परंपराएं
  2. पुनर्वास की तलाश में कुछ परिवार दंडकारण्य पहुंचे।
  3. समय के साथ इस विस्थापन ने नई पहचान का रूप लिया।

अनिमेष पाल, जगदलपुर। दुर्गा पूजा के पंडालों में ढाक की थाप और शंखनाद गूंजता है, तो बस्तर में बसे बंगाली परिवारों की स्मृतियों में बंगाल भी जीवंत हो उठता है। मां दुर्गा की आराधना उनके लिए केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि उन पुरखों की याद से जुड़ा पर्व भी है, जिन्होंने विभाजन के बाद अपना घर-बार छोड़कर अनजान धरती पर जीवन शुरू किया। समय के साथ इस विस्थापन ने नई पहचान का रूप लिया। जगदलपुर की मूर्तिलाइन इसी यात्रा की साक्षी है, जहां बंगाली शिल्पकारों के हुनर ने बस्तर की आदिवासी कला से जुड़कर साझा सांस्कृतिक विरासत रची।

1947 के विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल, जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहलाया, से भारत आने वाले परिवारों का सिलसिला कई दशकों तक चला। सांप्रदायिक तनाव और असुरक्षा के बीच अनेक परिवारों को अपनी जमीन, घर और परिचित परिवेश छोड़ना पड़ा। पुनर्वास की तलाश में कुछ परिवार दंडकारण्य पहुंचे। उनके सामने आजीविका जुटाने के साथ अपनी भाषा, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को सहेजने की चुनौती भी थी।


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शीतल कुंडु अपने बेटे अनिल के साथ बस्तर की शिल्प परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। बंगाली परिवारों के हुनर और स्थानीय आदिवासी कला के मेल से मूर्तिलाइन की पहचान बनी, जो आज पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।

टेंट से शुरू हुआ कारोबार, बनी मूर्तिलाइन

आज चांदनी चौक से शहीद पार्क की ओर जाने वाली सड़क पर लकड़ी की कलाकृतियों और फर्नीचर की दुकानें इस संघर्ष की कहानी कहती हैं। एन. गोपाल ब्रदर्स के संचालक धनंजय बारोई बताते हैं कि उनके पिता पूर्वी पाकिस्तान में फर्नीचर का व्यवसाय करते थे। जगदलपुर पहुंचे तो शुरुआत टेंट में रहकर की।

बाद में सड़क किनारे छोटी दुकान बनाई और फर्नीचर के साथ लकड़ी की मूर्तियां बनाने लगे। उस समय गोल बाजार प्रमुख कारोबारी केंद्र था। कलाकृतियां बनाकर वहीं बेचने ले जाते थे।

धीरे-धीरे शिल्पकारों ने बस्तर के आदिवासी जीवन, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को अपनी कलाकृतियों में जगह दी। बंगाल से आया शिल्प कौशल स्थानीय जीवन से जुड़ा, तो लकड़ी की आकृतियों में बस्तर की अपनी दुनिया उभरने लगी। दुकानें बढ़ीं और यह इलाका मूर्तिलाइन के नाम से पहचाना जाने लगा।

गणेश फर्नीचर के संचालक शीतल कुंडु बताते हैं कि उनका परिवार 1964 में माना कैंप पहुंचा और 1973 में जगदलपुर में बस गया। करीब 40 साल पहले उन्होंने फर्नीचर का कारोबार शुरू किया। बाद में स्थानीय घड़वा शिल्प और दूसरे हस्तशिल्प उत्पादों को भी व्यवसाय से जोड़ा।

दंडकारण्य में पुनर्वास की पहल

केंद्रीय गृह मंत्रालय की 1989-90 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए 1958 में दंडकारण्य परियोजना शुरू की गई थी। इसके तहत 25,231 परिवारों को चार क्षेत्रों में बसाया गया। इनमें तत्कालीन मध्य प्रदेश के बस्तर जिले के परलकोट और कोंडागांव तथा तत्कालीन ओडिशा के मलकानगिरी और उमरकोट शामिल थे।