बस्तर दशहरा विशेष : जिनके पुरखे उजड़े, उनकी बस्तियों में अब बसता है नया शहर
पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर बस्तर पहुंचे बंगाली हिंदू परिवारों ने इसी पीड़ा के बीच नई जिंदगी शुरू की। कभी शहर से दूर घने जंगलों के बीच बसी उनकी...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 20 Oct 2026 11:11:36 AM (IST)Updated Date: Tue, 20 Oct 2026 11:13:26 AM (IST)
दुर्गोत्सव की परंपरा को सहेजने के साथ पंडाल की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी निभाते सुब्रतो बिश्वास। अड़ावाल में अपनी हार्डवेयर दुकान पर अशोक बनिक बताते हैं बदलाव की कहानी, जहां कभी उनके परिवार की छोटी-सी झोपड़ी में किराना दुकान हुआ करती थी।-नईदुनियाHighLights
- पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित बंगाली परिवारों ने दंडकारण्य में बसाई नई दुनिया
- दुर्गोत्सव से संस्कृति को सहेजने और कारोबार से बस्तर के विकास तक की कहानी
- बंगाल की संस्कृति जीवित है तो बाजारों में पीढ़ियों के संघर्ष की छाप दिखाई देती है।
अनिमेष पाल, जगदलपुर। दुर्गोत्सव में ढाक की थाप गूंजती है, पूजा पंडालों में धूप-दीप की सुगंध फैलती है और मां दुर्गा की आराधना में बंगाली समाज जुटता है। इन उत्सवों के पीछे विस्थापन का वह दर्द भी है, जब परिवारों को अपनी जमीन, घर और पुरखों की मिट्टी छोड़नी पड़ी थी।
पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर बस्तर पहुंचे बंगाली हिंदू परिवारों ने इसी पीड़ा के बीच नई जिंदगी शुरू की। कभी शहर से दूर घने जंगलों के बीच बसी उनकी छोटी-छोटी बस्तियां आज जगदलपुर के विस्तार और व्यापारिक गतिविधियों का हिस्सा हैं। आड़ावाल का ओरना कैंप इसकी मिसाल है।
जिस इलाके में कभी जंगल और झोपड़ियां थीं, वहां आज पक्के मकान, दुकानें और कारोबार की चहल-पहल है। दुर्गोत्सव के पंडालों में बंगाल की संस्कृति जीवित है तो बाजारों में पीढ़ियों के संघर्ष और मेहनत की छाप दिखाई देती है।
झोपड़ियों से व्यापारिक केंद्र तक का सफर
ओरना कैंप बंगाली दुर्गोत्सव समिति के अध्यक्ष सुब्रतो बिश्वास बताते हैं कि उनका परिवार 1964 में पूर्वी पाकिस्तान के कोमिला जिले से यहां आया था। उनके दादा महारानी अस्पताल में कंपाउंडर थे। उस समय आड़ावाल के आसपास घना जंगल था। शहर से दूर इस इलाके में विस्थापित बंगाली हिंदू परिवारों को बसाया गया था।
शुरुआती दिनों में परिवारों ने छोटी-छोटी झोपड़ियों में दुकानें खोलीं। सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ कारोबार धीरे-धीरे बढ़ा। एनएमडीसी की गतिविधियां बढ़ने के साथ क्षेत्र में बाजार का विस्तार हुआ और दूसरे व्यापारियों ने भी यहां प्रतिष्ठान खोले। आज ओरना कैंप के आसपास कपड़े, सराफा, आटोमोबाइल और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान उपलब्ध है।
झोपड़ी की दुकान से करोड़ों का कारोबार
- अड़ावाल में अपनी हार्डवेयर दुकान पर अशोक बनिक बताते हैं बदलाव की कहानी, जहां कभी उनके परिवार की छोटी-सी झोपड़ी में किराना दुकान हुआ करती थी।
- आयुष हार्डवेयर के संचालक अशोक बनिक का परिवार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के नोआखली का है। उनके पिता ने यहां एक झोपड़ी में किराने की दुकान शुरू की थी।
- समय के साथ कारोबार बदला और आज परिवार का हार्डवेयर व्यवसाय सालाना लगभग 10 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंच चुका है। शाहा परिवार की मिठाई की दुकान भी क्षेत्र की पहचान है।
- झोपड़ियों की जगह पक्के मकानों और दुकानों ने ले ली है। इन परिवारों ने मेहनत और उद्यम से नई धरती पर अपनी पहचान बनाई।
विस्थापित बंगाली परिवारों ने दंडकारण्य में गढ़ी नई पहचान
- केंद्रीय गृह मंत्रालय की 1989-90 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए 1958 में दंडकारण्य परियोजना शुरू की गई थी।
- इसके तहत 25,231 परिवारों को चार क्षेत्रों में बसाया गया। इनमें तत्कालीन मध्य प्रदेश के बस्तर जिले के परलकोट और कोंडागांव तथा तत्कालीन ओडिशा के मलकानगिरी और उमरकोट शामिल थे।
- जगदलपुर की मूर्तिलाइन से लेकर ओरना कैंप तक इन परिवारों की मौजूदगी उस इतिहास की याद दिलाती है। दुर्गोत्सव के जरिए उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजा और कारोबार के सहारे बस्तर की अर्थव्यवस्था में योगदान दिया।
- जिन पुरखों ने अपनी जमीन खोई थी, उनकी अगली पीढ़ियों ने इसी धरती पर अपने सपनों की नई दुनिया बसा दी।