
नवदुिनया प्रतिनिधि, भोपाल। बौद्ध धर्म में वषार्वास का विशेष महत्व है। वषार्वास के दौरान बौद्ध भिक्षु तीन महीने तक विचरण न कर और एक जगह पर रहकर भगवान बुद्ध का ध्यान लगाएंगे, पूजा अर्चना करेंगे। आषाढ़ मास के पूर्णिमा से शुरू होने वाला वषार्वास इस बार 17 जुलाई से शुरू होगा। जिसके लिए बौद्ध उपासक-उपासिकाओं द्वारा बौद्ध भिक्षुओं से प्रार्थना का दौर शुरू हो गया है। भेल क्षेत्र में स्थित अशोका बुद्ध विहार में भंते मेत्तानंद से बौद्ध उपासक एवं उपासिकाओं सहित सोसायटी के सभी पदाधिकारियों ने याचना की है। इस मौके पर समिति अध्यक्ष भीमराव पटाइत, अभिमान सोनवाने, गिरिश मेश्राम, कुणाल वासनिक, राजेश वाघमारे, सतीष बोदाडे, सुनील बोरसे, सिध्दार्थ मोरे, गणेश सोमकुंवर, धनपाल भोइते, सुभाष बाविसकर हेमराज मोरे मौजूद रहे।
वहीं शहर के अन्य बुद्ध विहार- वैशाली बुद्ध विहार में भंते शरणकर, सुजाता बुद्ध विहार में भंते डा. सुगंधबोधि, सारीपुत्र बुद्ध विहार में भंते रत्न बोधि एवं रानी कमलापति रेलवे स्टेशन परिसर में स्थित सम्राट अशोक बुद्ध विहार में भिक्षुणी नागरुपा वषार्वास करेंगी। सोसाइटी के समन्वयक सुरेश जाधव ने बताया कि वषार्वास के तीन महीने बौद्ध भिक्षु बुद्ध विहारों में ध्यान, साधना एवं शील प्रतिपालन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। वषार्वास के समय अनुयायियों द्वारा अपने निवास पर भोजन दान एवं धम्म प्रवचन आयोजित किए जाते हैं, वषार्वास का अधिष्ठान आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अश्विनी पूर्णिमा (प्रवरणा) तक चलता है। पूरे तीन महीने भिक्षुओं द्वारा शील, समाधि, विपश्यना, ध्यान एवं साधना का अध्ययन करते हुए एक ही बुद्ध विहार में अधिष्ठान लेते हैं। तथा उपासकों को धम्म देशना देते हैं जिससे कि उपासकों द्वारा धम्म आचरण का पूर्ण रूप से पालन किया जाता है ।