मल्टीमीडिया डेस्क। हिंदुस्तान पर्वों, त्यौहारों और महोत्सवों की धरती है। यहां चारों और विविध संस्कृतियां, मत और धर्म को मानने वाले लोग निवास करते हैं। हिंदू धर्म में कई मत और संप्रदायों को मानने वाले लोग हैं, जिनकी विचारधारा और परंपराएं अलग-अलग है। ऐसा ही विशाल, भव्य, कई परंपराओं को अपने में समेटे हुए दिपावली पर्व है। इस त्यौहार का चरमोत्कर्ष लक्ष्मी पूजा के दिन दिखाई देता है। इसी क्रम में दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का आयोजन किया जाता है।
गोवर्धन पूजा की कथा
गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक पौराणिक लोकगाथा प्रचलित है। इसके अनुसार स्वर्गाधिपति देवराज इन्द्र को एक बार अभिमान हो गया था। इन्द्रदेव के घमंड को खत्म करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने लीला रचने का निश्चय किया। एक दिन उन्होंने देखा कि ब्रजवासी किसी पूजा की तैयारी कर रहे हैं और उसके लिए कई तरह के पकवान तैयार कर रहे हैं । अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से इस संबंध में पूछा। तब माता यशोदा ने कहा कि हम सभी ब्रजवासी देवराज इन्द्र के प्रसन्न करने के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं।
तब श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से कहा कि मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं। तब यशोदा माता ने कहा कि इन्द्र वर्षा के देवता हैं। वह बारिश करवाते हैं, जिससे हमको जल मिलता है और धरती को अन्न-जल मिलता है और हमारे गौधन को आहार मिलता है। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि तब तो हम ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करना चाहिए। हमारा गौधन गोवर्धन पर चरता है और वहीं हमारी गायों को पालता है। इन्द्र कभी दर्शन नहीं देते हें और पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हे इसलिए ऐसे घमंडी देव की पूजा नहीं करना चाहिए।
इंद्र ने की ब्रज में मूसलाधार बारिश
जैसे ही ब्रजवासियों ने गोवर्धन पूजा प्रारंभ की, इन्द्र ने इसको अपना अपमान समझा और ब्रज में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। जलप्रलय को देखते हुए सभी ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण से इसका उपाय तलाशने की गुहार लगाई। तब श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी कमर में लटकाई और गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर धारण कर लिया। गोवर्धन के नीचे सभी ब्रजवासियों और गौधन ने शरण ले ली। यह देखकर इन्द्र और क्रोधित हुए और बारिश तेज कर दी। तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप ऊपर रहकर बारिश के वेग को नियंत्रित करें और शेषनाग को मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकने को कहा।
इन्द्र ने लगातार सात दिनों तक मूसलाधार बारिश करके अपना कोप ब्रजवासियों पर बरसाया। ब्रजवासियों पर कोई असर पड़ता न देख वह ब्रह्माजी के पास गए और इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बताया की उनका मुकाबला साक्षात श्रीहरी के अवतार श्रीकृष्ण से है। उसके बाद देवराज इन्द्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से अपनी गलती की क्षमायाचना की और उनकी पूजा कर उनको भोग लगाया। इसके बाद से ही ब्रजमंडल में गोवर्धन पूजा का प्रारंभ हुआ। इस दिन गौधन को सजा-संवारकर उनकी पूजा की जाती है।
इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।