जितिया से भी कठिन! मिथिलांचल का सबसे दुर्लभ 'हरिवासल व्रत'...12 साल बाद 2026 में बना इसका योग
मिथिलांचल में बेहद पवित्र और कठिन माना जाने वाला 'हरिवासल व्रत' 12 सालों के लंबे अंतराल के बाद सितंबर 2026 में आ रहा है। मधुबनी के विद्वानों के अनुसार...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 19 Sep 2026 05:40:04 PM (IST)Updated Date: Sat, 19 Sep 2026 05:40:04 PM (IST)
मिथिलांचल का प्रसिद्ध और कठिन हरिवासल व्रत, जो 12 सालों के बाद मनाया जाएगा। (AI जनरेटेड)HighLights
- 'हरिवासल व्रत' 12 साल बाद 2026 में रखा जाएगा
- इस व्रत को जितिया से भी ज्यादा कठिन व्रत माना गया
- इस व्रत में की कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मिथिलांचल की पावन भूमि पर कई ऐसे कठिन और दुर्लभ व्रत रखे जाते हैं, जिनकी महत्ता युगों-युगों से चली आ रही है। इन्हीं में से एक है अत्यंत दुर्लभ और कठिन माना जाने वाला 'हरिवासल व्रत'। मान्यता है कि यह व्रत जितिया से भी अधिक कठिन होता है। इसका संयोग लगभग 10 से 12 साल में एक बार बनता है।
साल 2026 में यह दुर्लभ महासंयोग 12 सालों बाद बन रहा है, जो 21 सितंबर से शुरू होकर 24 सितंबर 2026 तक चलेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस चार दिवसीय महाव्रत में भगवान श्री हरि विष्णु, देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती की विशेष आराधना की जाती है।
क्यों माना जाता है जितिया से भी कठिन?
आम तौर पर जितिया या हरतालिका तीज का व्रत 24 से 36 घंटे का निर्जला उपवास होता है। लेकिन हरिवासल व्रत में लगातार चार दिनों तक कठोर संयम, नियमों और दो दिनों तक पूर्णतः निर्जला (बिना अन्न और जल के) उपवास का पालन करना पड़ता है। इसी कारण इसे मिथिलांचल का सबसे कठिन व्रत माना गया है।
हरिवासल व्रत 2026: 4 दिनों की तिथियां और नियम
यह व्रत महिला, पुरुष, युवा या बुजुर्ग कोई भी रख सकता है, बशर्ते वे चार दिनों के इस कठिन नियमों का पालन करने में शारीरिक रूप से समर्थ हों-
- पहला दिन (सोमवार, 21 सितंबर 2026 - एकभुक्त): व्रत के पहले दिन दिनभर उपवास रखा जाता है और शाम के समय एक समय शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है।
- दूसरा और तीसरा दिन (मंगलवार 22 सितंबर व बुधवार 23 सितंबर - निर्जला उपवास): ये दो दिन व्रत के सबसे कठिन दिन होते हैं। इन दोनों दिनों तक जल की एक बूंद और अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया जाता। लगातार दो दिनों तक पूर्ण निर्जला रहकर भगवान विष्णु व शिव-पार्वती का ध्यान किया जाता है।
चौथा दिन (गुरुवार, 24 सितंबर 2026 - पूजन व पारण): चौथे दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। तत्पश्चात ब्राह्मण भोजन, सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देने के बाद शाम को एक समय सात्विक भोजन करके व्रत संपन्न किया जाता है। व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य विशेष नियम
- नियम- संयम: व्रत के चारों दिनों के दौरान दातुन/ब्रश करने, घर में झाड़ू लगाने और जूठे बर्तनों को छूने की पूरी तरह मनाही होती है।
- पारण की सही विधि: चौथे दिन पूजा-पाठ और दान के बाद गंगाजल या शरबत पीकर ही व्रत का पारण किया जाता है।
(नोट: यह जानकारी मिथिलांचल की स्थानीय लोक परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और पंडित आत्माराम (मधुबनी) के कथनों पर आधारित है।)