
प्रणय चौहान, इंदौर। इस बार भाद्रपद की एक तिथि आस्था के दो रंगों से आलोकित होगी। एक ओर सुहाग और अटूट संकल्प का निर्जला तप होगा, तो दूसरी ओर विघ्नहर्ता गणपति के मंगल आगमन की उमंग। 14 सितंबर को हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक ही दिन मनाई जाएगी। तीन प्रमुख तीज पर्वों में सबसे कठिन माने जाने वाले हरतालिका के निर्जला व्रत के साथ घर-घर गणपति की स्थापना होगी। शिव-पार्वती की आराधना और गणपति वंदना का यह संयोग इस बार पर्व की आभा को और विशेष बना रहा है।
ज्योतिषी पं. गुलशन अग्रवाल के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया 13 सितंबर को सुबह 7.10 बजे आरंभ होकर 14 सितंबर को सुबह 7.08 बजे समाप्त होगी। तृतीया 14 सितंबर की भोर में विद्यमान रहने के कारण हरतालिका तीज इसी दिन मनाई जाएगी। विशेष संयोग यह है कि इसी दिन गणेश चतुर्थी भी है। ऐसे में भोर की वेला से लेकर प्रदोष काल तक शिव-पार्वती और गणपति की आराधना का वातावरण बना रहेगा।
हरियाली, कजरी और हरतालिका, तीनों तीज पर्वों की जड़ें मां पार्वती और भगवान शिव की भक्ति में हैं। लेकिन हरतालिका का स्वरूप सबसे कठोर माना गया है। इसमें दिन और रात तक निर्जला व्रत रखने की परंपरा है। जल की एक बूंद ग्रहण किए बिना किया जाने वाला यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और संकल्प की साधना माना जाता है। विवाहित महिलाएं दांपत्य की मंगलकामना और परिवार के सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी युवतियां भगवान शिव जैसा योग्य वर पाने की प्रार्थना करती हैं।
सितंबर में चार बड़े ग्रहों का महागोचर, कई राशियों के लिए खुलेंगे तरक्की के द्वार
पं. अग्रवाल के अनुसार हरतालिका तीज के पूजन के लिए सुबह 6.05 से 7.06 बजे तक का समय शुभ रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4.32 से 5.19 बजे तक रहेगा। हालांकि भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा के लिए प्रदोष काल को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। 14 सितंबर को प्रदोष काल शाम 6.28 से रात 8.47 बजे तक रहेगा। शाम ढलने के साथ जब मंदिरों और घरों में दीप प्रज्ज्वलित होंगे, तब शिव-पार्वती की आराधना के स्वर वातावरण को भक्तिमय करेंगे। इसी वेला में सुहागिनें और व्रती महिलाएं अपने आराध्य के समक्ष श्रद्धा के साथ मनोकामनाएं अर्पित करेंगी।
हरतालिका के पीछे मां पार्वती की अटूट साधना की कथा है। मान्यता है कि मां पार्वती भगवान शिव को पति रूप में वरण करना चाहती थीं, लेकिन उनके पिता राजा हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अपनी पुत्री के मन की पीड़ा जानकर उनकी सखी उन्हें वन में ले गईं। वहीं एकांत वन में मां पार्वती ने सांसारिक मोह से दूर भगवान शिव को पाने का संकल्प लिया। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को उन्होंने रेत और मिट्टी से शिवलिंग का निर्माण कर कठोर तप किया और पूरी रात भगवान शिव की आराधना में लीन रहीं। उनकी अनन्य भक्ति और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और मां पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इसी प्रसंग की स्मृति में हरतालिका का व्रत श्रद्धा और संकल्प के साथ किया जाता है।
- हरतालिका तीज शिव-पार्वती के प्रेम, तप और अटूट समर्पण का पर्व है, तो गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता के मंगल आगमन का उत्सव।
- इस बार दोनों पर्व एक ही दिन होने से आस्था का वातावरण और अधिक विशेष होगा।
- सुबह से जहां व्रत और पूजन की तैयारियां होंगी, वहीं घरों और पंडालों में गणपति स्थापना की रौनक दिखाई देगी।
- कहीं शिव-पार्वती की आराधना होगी, तो कहीं गणपति बप्पा मोरया के जयकारे गूंजेंगे।