मल्टीमीडिया डेस्क। भोलेनाथ वैराग्य के देवता हैं और भांग, धतूरे जैसी वस्तुओं में उनकी आसक्ति है। भक्त भोलेनाथ को ऐसी सभी वस्तुओं का अर्पण करते हैं। और भोलेनाथ इन सभी जंगली वस्तुओं को ग्रहण कर अपने भक्तों को कल्याण का वरदान देते हैं। इसलिए महादेव को बुराईयों के विघ्वंस और दुष्टों के साथ जगत को सुखी-संपन्न करने का वरदान देते हैं।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम: शिवाय् ॥

जो शिव यक्ष के रूप को धारण करते हैं और लंबी–लंबी खूबसूरत जिनकी जटायें हैं, जिनके हाथ में 'पिनाक' धनुष है, जो सत् स्वरूप हैं अर्थात् सनातन हैं, दिव्यगुणसम्पन्न उज्जवलस्वरूप होते हुए भी जो दिगम्बर हैं, ऐसे उस यकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।

लिंग पुराण में विभिन्न प्रकार के दानों का वर्णन किया गया है। मार्गशीर्ष मास में जो उपासक बैल को शिवजी के नाम से छोड़ता है। वह शिव और देवी भवानी के साथ आनंद को प्राप्त करता है। पौष के महीने में त्रिशूल को दान करने वाला, माघ के महीने में रथ का दान करने वाला, फाल्गुन मास में सोने और चांदी की प्रतिमा बनाकर शिव मंदिर में स्थापना करने वाला देवी भवानी के सामिप्य को प्राप्त करता है।

चैत्र मास में शिव, भवानी, नंदी आदी की तांबे की प्रतिमा बनाकर स्थापना करने वाला, वैशाख मास में कैलाश नाम के शिवजी के व्रत को करने वाला कैलाश पर्वत पर माता भवानी के सामिप्य को प्राप्त करता है। जेठ के महीने में शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा करने वाला, ब्राह्मणों को भोजन कराने वाला देवी के सामिप्य को प्राप्त करता है। आषाड़ मास में भवन बनाकर, वस्त्र, अन्न और धन के साथ दान करने वाला गौलोकवासी होकर शिव के सामिप्य को प्राप्त करता है। सावन में तिल का पर्वत बनाकर ब्राह्मण के धन-धान्य के साथ दान करने पर शिवलोक में जगह पाता है।

भादों में चावल का पर्वत का दान करने वाला कैलाशवासी बनता है। क्वार मास में विभिन्न प्रकार के अनाजों का पर्वत बनाकर स्वर्ण युक्त कर ब्राह्मण का दान करने वाला शिवलोक में जगह पाता है। कार्तिक मास में उमा-महेश की सोने की प्रतिमा बनाकर दान करने से शिव का सामिप्य प्राप्त होता है।

योगेंद्र शर्मा