
धर्म डेस्क। कार्तिक अमावस्या की रात जब दीपों की रोशनी से शहर जगमगाता है, तब आस्था का एक और अलौकिक संसार आकार लेता है। मां काली के स्वागत में कहीं भव्य पंडाल सजते हैं तो कहीं मंदिरों में विशेष श्रृंगार के साथ पूजा की तैयारियां होती हैं। शंखध्वनि, घंटियों की गूंज और मंत्रोच्चार के बीच पूरा बिलासपुर शक्ति की आराधना में लीन नजर आता है। बिलासपुर में काली पूजा का स्वरूप लगातार विस्तार ले रहा है।
रेलवे परिक्षेत्र की ऐतिहासिक कालीबाड़ी से लेकर तिफरा काली मंदिर, मंगला, सरकंडा मुक्तिधाम स्थित मंदिर और राजकिशोर नगर तक मां काली की प्रतिमाएं स्थापित कर विधि-विधान से आराधना की जाती है। अलग-अलग मोहल्लों में आकर्षक पंडालों और रोशनी से सजे पूजा स्थलों पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
इस साल आठ नवंबर को काली पूजा होगी। मंगला में मां काली के भव्य स्वागत और आगमन को लेकर विशेष आयोजन की तैयारी है। यहां सजेगा मां का आकर्षक दरबार, जहां दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचेंगे। रेलवे परिक्षेत्र के कई पंडालों में मध्यरात्रि से शुरू होने वाली पूजा भोर तक चलती है।
बंगाली परिवारों में इस पर्व की विशेष मान्यता है। अब अन्य समाजों के परिवार भी पूरे विधि-विधान से घरों में मां की आराधना करते हैं। शहर के साथ आसपास के गांवों में भी काली पूजा का उत्साह बढ़ रहा है।
बंग समाज के मुकेश प्रमाणिक के अनुसार काली पूजा शक्ति की उपासना और बुराई पर विजय का प्रतीक है। महानिशा में मां की आराधना को विशेष फलदायी माना जाता है। यही वजह है कि श्रद्धालु पूरी रात भक्ति और समर्पण के साथ मां के दरबार में उपस्थित रहते हैं।
तिफरा स्थित काली मंदिर में कार्तिक अमावस्या पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है। मंदिर परिसर में मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। पूजन में लाल गुड़हल, कमल, सिंदूर, नारियल, फल, मिष्ठान, धूप और दीप जैसी सामग्री का विशेष महत्व है। मां का श्रृंगार कर महानिशा के शुभ समय में मंत्रोच्चार के साथ अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ सामूहिक जुड़ाव का भी प्रमुख केंद्र है।