करवा चौथ पर चांद की पूजा क्यों होती है, सूरज की क्यों नहीं? जानें छलनी से चांद देखने के पीछे छिपा पौराणिक सच
कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाए जाने वाले करवा चौथ के निर्जला व्रत में सुहागिन महिलाएं सूर्यदेव के बजाय विशेष रूप से चंद्रमा की पूजा करती हैं। ज्योतिष और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव तेज और उग्रता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि चंद्रमा शीतलता, मन, शांति और प्रेम के कारक हैं।
Publish Date: Mon, 26 Oct 2026 04:51:40 PM (IST)Updated Date: Mon, 26 Oct 2026 04:51:40 PM (IST)
करवा चौथ पर सूर्यदेव के बजाय चंद्रमा की पूजा का महत्वHighLights
- करवा चौथ पर सूर्यदेव के बजाय चंद्रमा की पूजा का महत्व
- इस दिन चंद्र देव और उनकी प्रिय पत्नी रोहिणी का नक्षत्र संयोग
- इस साल करवा चौथ पूजा मुहूर्त शाम 5:38 से 6:56 बजे तक है
धर्म डेस्क। सनातन धर्म में पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और अटूट दांपत्य जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक पर्व 'करवा चौथ' कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को संपूर्ण देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से पूर्व से लेकर रात में चंद्रोदय तक कठोर निर्जला व्रत का पालन करती हैं।
करवा चौथ के पूजन विधान में भगवान शिव, माता पार्वती, विघ्नहर्ता श्री गणेश और करवा माता के साथ मुख्य रूप से चंद्रदेव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने की परंपरा है। अक्सर यह सवाल उठता है कि दिन के देवता सूर्य के बजाय रात में चंद्रमा की ही पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे ज्योतिषीय, पौराणिक और दार्शनिक आधार मौजूद हैं।
आइए जानते हैं चंद्र पूजन का रहस्य, 'करवा चौथ' शब्द का अर्थ, पूजन मुहूर्त और चंद्रोदय का समय-
सूर्य के स्थान पर चंद्रमा की पूजा का ज्योतिषीय और पौराणिक कारण
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, शांति, शीतलता और आत्मीय प्रेम का अधिष्ठाता माना गया है। इसके विपरीत सूर्य देव तेज और उग्रता के प्रतीक हैं। दांपत्य जीवन में उग्रता के बजाय शांति, धैर्य और प्रेम की आवश्यकता होती है, इसलिए स्त्रियां वैवाहिक जीवन में शीतलता और मधुरता की कामना के साथ चंद्रदेव को अर्घ्य देती हैं।
चंद्रमा को शाश्वत चक्र और वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। चंद्रदेव की आराधना से पति को लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार को सुख-समृद्धि मिलती है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, चंद्रदेव अपनी 27 पत्नियों (नक्षत्रों) में से 'रोहिणी' से सर्वाधिक प्रेम करते थे। करवा चौथ के दिन रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग बनता है, जो दांपत्य जीवन में अनन्य निष्ठा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण के परामर्श पर द्रौपदी ने पांडवों के जीवन की रक्षा और विजय के लिए करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा था।
क्या है 'करवा चौथ' का वास्तविक अर्थ?
- करवा: 'करवा' मिट्टी से बने उस छोटे मटके या पात्र को कहा जाता है, जिसमें शुद्ध जल भरा जाता है।
- चौथ: कार्तिक कृष्ण पक्ष की 'चतुर्थी तिथि' को चौथ कहा जाता है।
- सुहागिन महिलाएं मिट्टी के नए करवे में जल भरकर चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करती हैं, इसी कारण इस व्रत को 'करवा चौथ' के नाम से जाना जाता है।
करवा चौथ 2026: पूजा मुहूर्त, सरगी और चंद्रोदय का समय
- त्योहार की तिथि- 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार
- सरगी खाने का शुभ समय- सूर्योदय (लगभग 06:30 AM) से पूर्व, प्रातः 03:30 से 05:30 बजे तक
- करवा चौथ पूजन मुहूर्त- शाम 05:38 से शाम 06:56 बजे तक (अवधि: 1 घंटा 18 मिनट)
- चंद्रोदय का अनुमानित समय- रात 08:17 बजे (स्थानीय मौसम और शहर के अनुसार समय में अंतर संभव)
व्रत और पारण की पारंपरिक विधि
- संध्याकालीन पूजा: शुभ मुहूर्त (शाम 05:38 से 06:56 बजे) में महिलाएं एक साथ बैठकर भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश जी और करवा माता की विधिवत पूजा करती हैं तथा करवा चौथ की पारंपरिक व्रत कथा का श्रवण करती हैं।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य: रात्रि 08:17 बजे के बाद जब चंद्रमा उदित होता है, तब छलनी की ओट से चंद्रदेव के दर्शन किए जाते हैं।
- अर्घ्य अर्पण: मिट्टी के करवे से चंद्रमा को जल, दूध और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दिया जाता है तथा पति की लंबी उम्र की प्रार्थना की जाती है।
- व्रत खोलना: इसके पश्चात छलनी से पति का मुख देखा जाता है और पति के हाथों से जल ग्रहण कर सुहागिनें अपना निर्जला व्रत पूर्ण करती हैं।