
धर्म डेस्क। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सोलह दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन होता है। यह व्रत भादौ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से आरंभ होता है। सोलह दिनों तक महालक्ष्मी पूजन के बाद व्रती महिलाएं कुंवार मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूजन-पाठ के साथ व्रत पूरा करती हैं।
इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन तीन अक्टूबर को है। इस दिन महालक्ष्मी व्रत में पहले देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इसके बाद हाथी की पूजा का विधान है।
हाथी पूजा के लिए बाजार से मिट्टी से बनी हाथी की प्रतिमा लेकर आएं। हाथी को कुंकुम से तिलक करें, चावल लगाएं और अबीर-गुलाल आदि चीजें एक-एक करके अर्पित करें।

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हाथी को हल्दी लगी हुई दूर्वा चढ़ाने का विशेष महत्व है। हाथी पूजन के लिए घर पर ही बेसन से हार, बाजूबंद व अन्य आभूषण बनाए जाते हैं। सोलह प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं।
पूजा के बाद किसी सुहागिन महिला को भोज कराया जाता है तथा दान-दक्षिणा प्रदान की जाती है। भोजन के लिए आमंत्रित सुहागिन को भी पूरे दिन व्रत रखना होता है। फलाहार आदि व्रती महिला द्वारा दिया जाता है।