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शारदीय नवरात्रि डे 3: पढ़ें भय, रोग और शत्रुओं से मुक्ति दिलाने वाली 'मां चंद्रघंटा' की सम्पूर्ण कथा

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। दस भुजाओं और मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली मां चंद्रघंटा...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Akriti kumari
Publish Date: Tue, 13 Oct 2026 02:38:18 PM (IST)Updated Date: Tue, 13 Oct 2026 03:03:04 PM (IST)
शारदीय नवरात्रि डे 3: पढ़ें भय, रोग और शत्रुओं से मुक्ति दिलाने वाली 'मां चंद्रघंटा' की सम्पूर्ण कथा
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा। (AI जनरेटेड)

धर्म डेस्क। नवरात्रि के तीसरे दिन आदिशक्ति मां दुर्गा के तीसरे दिव्य स्वरूप मां चंद्रघंटा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, मां चंद्रघंटा की आराधना से साधक को हर प्रकार के भय, मानसिक तनाव, अलौकिक बाधाओं और असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।

मां के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा (अर्धचंद्र) सुशोभित होने के कारण इन्हें 'चंद्रघंटा' कहा जाता है। इनका स्वरूप अत्यंत मनमोहक, कांतिवान और वीरता का प्रतीक है।

मां चंद्रघंटा का अलौकिक स्वरूप

  • वाहन और वस्त्र: देवी चंद्रघंटा स्वर्ण के समान चमकीले वर्ण वाली हैं और वे 'सिंह' (बाघ) पर सवार होकर युद्ध की मुद्रा में सुसज्जित रहती हैं।
  • अस्त्र-शस्त्र: मां चंद्रघंटा की 10 भुजाएं हैं। इनमें त्रिशूल, गदा, खड्ग (तलवार), धनुष, बाण, कमंडल, कमल का पुष्प, अमृत कलश तथा अन्य दिव्य अस्त्र विराजमान हैं।
  • मुद्रा: मां की दो भुजाएं अपने भक्तों को आशीर्वाद (वरमुद्रा) और भय से मुक्ति (अभयमुद्रा) प्रदान करती हैं। उनके गले में सफेद पुष्पों की दिव्य माला है।

मां चंद्रघंटा की सम्पूर्ण पौराणिक व्रत कथा

देवी भागवत पुराण के अनुसार, दैत्यराज महिषासुर ने अपनी अपार आसुरी शक्तियों और वरदान के बल पर तीनों लोकों में भारी हाहाकार मचा रखा था। उसके अत्याचार और अहंकार से दसों दिशाएं कांप उठी थीं। उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर इंद्रदेव को पराजित कर दिया और देवताओं के अधिकार छीनकर उन्हें दर-दर भटकने पर विवश कर दिया।


महिषासुर के भय और अत्याचार से पीड़ित होकर सभी देवता, इंद्रदेव के नेतृत्व में त्रिदेवों- भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं ने महिषासुर के आतंक की आपबीती सुनाई।

देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उनके क्रोध की ज्वाला और सभी देवताओं के शरीर से निकली तेजोमय ऊर्जा एक जगह एकत्रित हुई और उससे एक अद्वितीय, परम सुंदरी और सर्वशक्तिशाली देवी का प्राकट्य हुआ।

भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र, इंद्रदेव ने दिव्य घंटा, वायु देव ने वेग, यमराज ने दण्ड तथा सूर्य और अग्निदेव ने अपना-अपना तेज और अस्त्र देवी को अर्पित किया। पर्वतराज हिमालय ने उन्हें वाहन के रूप में सिंह प्रदान किया।

जब मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा के रूप में अपनी प्रचंड और भयावह घंटे की ध्वनि से ब्रह्मांड को गुंजायमान किया, तो असुरों की सेना भयभीत हो उठी। मां चंद्रघंटा ने अपने अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से महिषासुर और उसकी विशाल असुर सेना का संहार कर दिया।

इस प्रकार, मां चंद्रघंटा ने देवताओं को उनके भय से मुक्ति दिलाई और तीनों लोकों में पुनः धर्म और शांति की स्थापना की।

मां चंद्रघंटा का सिद्ध ध्यान मंत्र

पूजा और कथा के दौरान इस सिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है-

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।

खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।

मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

पूजन का फल और लाभ

  • मां चंद्रघंटा का ध्यान मणिपुर चक्र में स्थित होता है, जिससे साधक में असीम साहस, वीरता और नम्रता का विकास होता है।
  • मां के घंटे की ध्वनि से घर की सभी नकारात्मक ऊर्जाएं, प्रेत बाधाएं और भय नष्ट हो जाते हैं।
  • साधक को अपने हर शुभ कार्य और निर्णय में सफलता प्राप्त होती है।