
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। श्राद्ध पक्ष के दौरान 3 अक्टूबर शनिवार को हाथी अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। यह 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का अंतिम दिन है। इस दिन गज पर विराजमान देवी महालक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है। इसी कारण आश्विन कृष्ण अष्टमी को हाथी अष्टमी या हाथी पूजन भी कहा जाता है। मान्यता है कि महालक्ष्मी की इस स्वरूप में पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है।
महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 19 सितंबर शनिवार से हुई थी और 3 अक्टूबर को इसका समापन होगा। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तीन अक्टूबर को सुबह सात बजकर 59 बजे शुरू होकर चार अक्टूबर रविवार को सुबह पांच बजकर 51 बजे तक रहेगी। अष्टमी तिथि तीन अक्टूबर को पूरे दिन रहने के कारण इसी दिन महालक्ष्मी व्रत और हाथी पूजन किया जाएगा। अष्टमी तिथि दो दिन पड़ने के कारण व्रत की तारीख को लेकर श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति बनी हुई थी।
धार्मिक मान्यता में हाथी को ऐश्वर्य, शक्ति, स्थिरता और राजसी वैभव का प्रतीक माना गया है। महालक्ष्मी का गज पर विराजमान स्वरूप समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल पर कलश स्थापित करती हैं। इसके बाद महालक्ष्मी के गज पर विराजमान स्वरूप का पूजन कर रोली, अक्षत, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को होगी गजलक्ष्मी व हाथी पूजा, धन संपत्ति की होती है वृद्धि
पूजन के दौरान महालक्ष्मी व्रत की कथा सुनने और देवी से परिवार की सुख-शांति, धन-धान्य एवं संतान के मंगल की कामना करने की परंपरा है। कई परिवारों में इस दिन हाथी की आकृति बनाकर या हाथी के चित्र के माध्यम से भी देवी का पूजन किया जाता है।
महालक्ष्मी व्रत के 16 दिनों में देवी के प्रति श्रद्धा, संयम और नियमित पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। अंतिम दिन होने वाला हाथी पूजन इस साधना की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। व्रत के समापन पर देवी को भोग अर्पित कर प्रसाद वितरित किया जाता है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।