
धर्म डेस्क। संतान के सुख, स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला संतान सप्तमी व्रत इस बार तिथि के गणित के कारण चर्चा में है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाए जाने वाले इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन किया जाता है। कुछ पंचांगों में सप्तमी का व्रत 18 सितंबर को भी दर्शाया गया है, लेकिन काशी के हृषीकेश पंचांग और जबलपुर के लोकविजय पंचांग के अनुसार संतान सप्तमी 17 सितंबर, गुरुवार को है। धर्मशास्त्रीय मत में पूर्व तिथि ग्रहण करने के विधान के कारण 17 सितंबर को व्रत करना श्रेयस्कर माना गया है।
आचार्य सोहन शास्त्री के अनुसार, संतान सप्तमी को मुक्ताभरण सप्तमी भी कहा जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी को भगवान शिव और माता पार्वती का विधि-विधान से पूजन कर उन्हें नैवेद्य में मीठी पूरी यानी मालपुआ अर्पित करने की परंपरा है। संतान सुख से वंचित दंपती तथा संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और जीवन में आने वाले कष्टों से मुक्ति की कामना रखने वाले माता-पिता के लिए यह व्रत विशेष फलदायी माना गया है।
आचार्य शास्त्री के अनुसार काशी के हृषीकेश पंचांग तथा जबलपुर के लोकविजय पंचांग में सप्तमी 17 सितंबर को दी गई है। तिथि 17 सितंबर को सुबह करीब 10.28 बजे से प्रारंभ होकर 18 सितंबर को दोपहर करीब 12.16 बजे तक रहेगी। निर्णय सिंधु के मत सप्तमीपूर्वयुता ग्राह्या के अनुसार पूर्व वाली तिथि ग्रहण करने का विधान है। चूंकि संतान सप्तमी का पूजन मध्यान्ह में किया जाता है और 17 सितंबर को मध्यान्ह काल में सप्तमी उपलब्ध है, इसलिए 17 सितंबर को व्रत करना श्रेयस्कर रहेगा।
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वहीं, ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे के अनुसार, इस वर्ष संतान सप्तमी का व्रत 17 सितंबर को रखा जाएगा। भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि 17 सितंबर को सुबह 10.03 बजे से शुरू होकर 18 सितंबर को सुबह 11.51 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर भी 17 सितंबर को ही व्रत रखने का निर्णय लिया गया है। पूजा का शुभ मुहूर्त 17 सितंबर को सुबह 10.11 बजे से दोपहर 3.46 बजे तक रहेगा।
पंडित दुबे बताते हैं कि संतान सप्तमी केवल संतान प्राप्ति की कामना का पर्व नहीं, बल्कि संतान के स्वस्थ, दीर्घ और सुखी जीवन की मंगलकामना का व्रत है। मान्यता है कि शिव-पार्वती की आराधना से संतान संबंधी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस व्रत को महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी रख सकते हैं।
आचार्य सोहन शास्त्री, परमहंसी गंगा आश्रम, झोतेश्वर के अनुसार जिन श्रद्धालुओं के लिए 18 सितंबर को व्रत रखना सुविधाजनक हो, वे भी पूजन कर सकते हैं। 18 सितंबर को सप्तमी दोपहर करीब 12 बजे तक रहेगी, इसलिए उस दिन पूजन करने वालों को मध्यान्ह से पहले पूजा पूरी कर लेनी चाहिए। हालांकि निर्णय सिंधु के पूर्व तिथि ग्रहण के सिद्धांत के आधार पर 17 सितंबर को व्रत करना अधिक श्रेयस्कर माना गया है।
17 सितंबर को संतान सप्तमी के साथ मोरियायी छठ और सूर्य षष्ठी का पर्व भी मनाया जाएगा। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा के पूजन का भी विधान है। आचार्य शास्त्री के अनुसार गुरुवार को भगवान कार्तिकेय के दर्शन का भी विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता में इस दिन कार्तिकेय दर्शन को पापों से मुक्ति और मंगलकारी फल से जोड़ा गया है। इस तरह 17 सितंबर को संस्कारधानी में शिव-पार्वती आराधना, संतान मंगलकामना, सूर्योपासना और विश्वकर्मा पूजन का धार्मिक संगम देखने को मिलेगा।