पितृ पक्ष 2026: 150 साल पुरानी पोथियों में आपकी वंशावली का राज! उज्जैन में ऑनलाइन तर्पण की भी सुविधा…60 साल बाद दुर्लभ ग्रह संयोग
सनातन धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए समर्पित 16 दिवसीय पितृ पक्ष पर इस बार 60 साल बाद अत्यंत दुर्लभ ग्रह संयोग बन रहा है। इस दौर...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 26 Sep 2026 11:13:33 AM (IST)Updated Date: Sat, 26 Sep 2026 11:13:33 AM (IST)
60 साल बाद पितृ पक्ष 2026 पर बन रहा है दुर्लभ ग्रह संयोग। (AI जनरेटेड)HighLights
- 60 साल बाद पितृ पक्ष पर सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु और शनि का दुर्लभ योग
- इस बार सर्वपितृ अमावस्या के साथ 'गजछाया योग' का महासंगम संयोग बन रहा है
- सिद्धवट, रामघाट और गया कोठा पर पितृ ऋण से मुक्ति के लिए लोग आएंगे
धर्म डेस्क। सनातन परंपरा में पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति, तर्पण और पिंडदान के लिए समर्पित पितृ पक्ष (महालय श्राद्ध) 2026 की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से हो गई है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस साल 1966 के बाद यानी लगभग 60 साल के बाद सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु और शनि ग्रहों की ऐसी विशेष पुनरावृत्ति हो रही है, जो पितृ ऋण से मुक्ति और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ मानी जा रही है।
26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर 2026 (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले इस 16 दिवसीय महालय श्राद्ध में पूजा-अर्चना और तर्पण का अनंत गुना फल मिलेगा।
26 सितंबर से शुरुआत, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या
- शुरुआती तिथि: भाद्रपद पूर्णिमा 26 सितंबर 2026 से पितृपक्ष का आरंभ माना जाएगा।
- प्रतिपदा श्राद्ध: 27 सितंबर से प्रतिपदा तिथि के श्राद्ध के साथ नियमित श्राद्धकर्म की शुरुआत होगी।
- समापन: 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृमोक्ष अमावस्या के साथ 15 दिवसीय पितृपक्ष का समापन होगा।
- लक्ष्मी नारायण योग: इस बार पितृपक्ष के दौरान तुला राशि में बुध और शुक्र की युति से अत्यंत शुभ 'लक्ष्मी नारायण योग' का भी निर्माण हो रहा है।
सर्वपितृ अमावस्या पर 'शनिश्चरी अमावस्या' और 'गजछाया योग' का महासंगम
आश्विन कृष्ण अमावस्या यानी 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। शनिवार के दिन अमावस्या होने से यह शनिश्चरी अमावस्या कहलाएगी। इसी दिन दुर्लभ 'गजछाया योग' का निर्माण भी हो रहा है। शास्त्रों में मान्यता है कि गजछाया योग के दौरान किया गया श्राद्ध और दान-पुण्य समस्त पितृ दोषों का निवारण कर पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करता है।
तिथि क्षय के बावजूद पूरे 16 दिन मनाया जाएगा श्राद्ध
पंचांग अनुसार इस बार पंचमी और अष्टमी तिथि का क्षय हो रहा है। इसके बावजूद धर्मशास्त्रीय नियमों के अनुसार एक ही दिन दो तिथियों के श्राद्ध के विधान से श्राद्धों की कुल संख्या 16 ही रहेगी। श्रद्धालु अपने कुल और परंपरा के अनुसार तिथियों पर कर्मकांड संपन्न कर सकते हैं।
उज्जैन के प्रमुख पितृ तीर्थ और धार्मिक महत्व
स्कंद पुराण के अवंती खंड के अनुसार, उज्जैन के तीन स्थल श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत पवित्र माने गए हैं:
- सिद्धवट घाट (प्रेत शिला तीर्थ): माता पार्वती द्वारा रोपित प्राचीन वटवृक्ष स्थल, जहां तर्पण से पितरों को शांति मिलती है।
- रामघाट (शिप्रा तट): उत्तरवाहिनी शिप्रा के तट पर पूजन व पिंडदान से पितृ ऋण उतरता है।
- गया कोठा: यह स्थल बिहार के गयाजी के समान ही फलदायी माना गया है।
यहां 12 प्रमुख पंडे और 400 से अधिक पंडित सिद्धवट, रामघाट और गया कोठा पर संपत्ति, संतान और सद्गति के लिए तर्पण व पूजन संपन्न कराते हैं।
150 साल पुरानी पोथियां और ऑनलाइन तर्पण की व्यवस्था
- 150 साल पुराना रिकॉर्ड: कई पीढ़ियों के नाम याद न होने पर उज्जैन के तीर्थ पुरोहितों के पास मौजूद 150 साल पुरानी बही-पोथियां काम आती हैं। श्रद्धालु अपने शहर, गोत्र और जाति की जानकारी देकर पूर्वजों के नाम व वंशावली जान सकते हैं। इन पोथियों को संपत्ति विवादों में कानूनी तौर पर मान्यता मिलने का भी दावा किया जाता है।
डिजिटल/ऑनलाइन तर्पण: उज्जैन न पहुंच पाने वाले श्रद्धालुओं के लिए पुरोहितों ने ऑनलाइन पूजा की व्यवस्था की है। पंडित जी सिद्धवट घाट से वीडियो कॉल/सोशल मीडिया के जरिए मंत्रोच्चार करते हैं और जजमान घर बैठे तर्पण करते हैं। (नोट: यह रिपोर्ट उज्जैन के ज्योतिषाचार्यों, तीर्थ पुरोहितों के बयानों, पंचांगीय गणनाओं और स्कंद पुराण की मान्यताओं पर आधारित है।)
यह भी पढ़ें- पितृ पक्ष में श्राद्ध के बाद आराम करने से नाराज होते हैं पूर्वज! भोजन करने के भी सख्त नियम