
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। अनंत चर्तुदशी के अगले दिन पूर्णिमा से पितृपक्ष शुरु हो जाएगा। इस पक्ष का समापन 10 अक्टूबर को होगा। पूर्णिमा से अमावस्या तक के इस पक्ष को पितृपक्ष कहा जाता है। मान्यता है कि इन पंद्रह दिनों में हमारे पुरखे धरती पर आते हैं। इस दौरान जिस तिथि पर परिजनों का निधन होता है उस तिथि पर उनकी स्मृति में ब्राह्मण भोज कराया जाता है तथा यथाशक्ति दक्षिणा दी जाती है। इसे श्राद्ध कहा जाता है। इस अवधि में शुभ कार्य वर्जित रहते हैं तथा किसी प्रकार की नई वस्तुएं नहीं खरीदी जाती हैं।
ज्योतिषी अरविंद पचौरी ने बताया कि जिस तिथि पर परिवार में किसी सदस्य का निधन हुआ है तो उस तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। सुबह स्नान करने के बाद नदी-तालाब में या घर पर ही तांबे या पीतल के पात्र में जल भर कर कुश और जौ लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर तर्पण करें।
इसके बाद मध्याह्न में कंडे पर अग्रि प्रज्जवलित धूप दें। इस अग्रि को परिवार के सभी लोग प्रणाम करें। इसके बाद ब्राह्मण को भोज कराएं। भोज के पहले पितृों के नाम की पातल सजाएं। पांच पातल निकालें, इन्हें कौवे, गाय, श्वान को खिलाएं। भोजन में खीर, कढ़ी और चने की दाल के बड़े अवश्य होना चाहिए।
Pitru Paksha 2025: कब से शुरू होगा पितृ पक्ष, कृपा प्राप्ति के लिए क्या करें और क्या नहीं?
डा अरविंद पचौरी ने बताया कि पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध को लेकर अक्सर लोगों को भ्रम होता है। दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर तिथि का है। 26 सितंबर को होने वाला पूर्णिमा श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए है जिनका निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ था। वहीं 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध उन लोगों के लिए होगा जिनका निधन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को हुआ था।