26 सितंबर से शुरू होगा पितृ पक्ष, 10 अक्टूबर को समापन, दोनों दिन शनिवार होना ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष
भाद्रपद पूर्णिमा यानी 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा, इसे ऋषि श्राद्ध भी कहा जाता है। इसके बाद 27 सितंबर से आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के साथ न...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 25 Sep 2026 12:25:37 PM (IST)Updated Date: Fri, 25 Sep 2026 12:37:03 PM (IST)
पितृ पक्ष।HighLights
- तर्पण करते समय काले तिल, कुश और जल का प्रयोग महत्वपूर्ण है।
- शनिवार के दिन पीपल की सेवा, दीपदान श्रद्धा से किया जा सकता है।
- काले चने, उड़द, मौसमी फल आदि का दान करने की भी परंपरा है।
धर्म डेस्क। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और कृतज्ञता का पर्व पितृ पक्ष इस बार विशेष संयोग के साथ आ रहा है। 26 सितंबर शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ पितृ पक्ष की शुरुआत होगी और 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा।
दोनों प्रमुख तिथियों का शनिवार को पड़ना धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष माना जा रहा है। पितृ पक्ष में श्रद्धा से किया गया तर्पण और दान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
भाद्रपद पूर्णिमा यानी 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा, इसे ऋषि श्राद्ध भी कहा जाता है। इसके बाद 27 सितंबर से आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के साथ नियमित श्राद्ध क्रम शुरू होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती।
तर्पण के साथ दान-पुण्य का महत्व
- पितृ पक्ष में तर्पण करते समय काले तिल, कुश और जल का प्रयोग परंपरा में महत्वपूर्ण माना गया है।
- शनिवार के दिन पीपल की सेवा, दीपदान और जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान भी श्रद्धा से किया जा सकता है। काले चने, उड़द, मौसमी फल आदि का दान करने की भी परंपरा है।
- भोजन बनाते समय पंचबलि की परंपरा के तहत गाय, कुत्ते, कौवे, चींटियों और देवताओं के लिए अंश निकालने की मान्यता है। शनिवार का संबंध ज्योतिष में शनि देव से माना जाता है।
- इसी कारण इस बार पितृ पक्ष के दोनों शनिवार को किए जाने वाले तर्पण, दान और सेवा को विशेष धार्मिक महत्व दिया जा रहा है।
- हालांकि पितृ दोष या शनि दोष से जुड़े ज्योतिषीय प्रभावों के बारे में अलग-अलग मत हैं।
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सादगी और संयम का समय
पितृ पक्ष को धार्मिक रूप से श्रद्धा, संयम और स्मरण का काल माना गया है। इस दौरान कई परिवार सात्विक भोजन करते हैं और मांस-मदिरा आदि से परहेज रखते हैं। परिवार की परंपरा और मान्यता के अनुसार शुभ-मांगलिक आयोजनों को टालने की परंपरा भी है।