कार्तिक शुक्ल की एकादशी को तुलसी पूजन का विधान है। इस वर्ष यह पर्व 3 नवंबर को है। तुलसी पूजन का पर्व पूरे उत्तर भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
तुलसी को विष्णु-प्रिया के नाम से भी जाना जाता है। तुलसी का पौधा भारतीयों के लिए गंगा-यमुना के समान पवित्र है।
व्रत की कथा
प्राचीन काल में जालंधर नाम का दैत्य था। उसने सारे संसार में उत्पात मचा रखा था। दैत्य की वीरता का रहस्य था उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रत धर्म। कहा जाता है कि उसी के प्रभाव से वह विजेता बनता था।
दैत्य के उत्पातों से परेशान होकर ऋर्षि-मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने काफी सोच विचार कर वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग करने का निश्चय किया।
उन्होंने योगमाया द्वारा एक मृत शरीर वृंदा के घर के बाहर फिकवा दिया। माया का पर्दा होने से वृंदा को अपने पति का शव दिखाई दिया।
अपने पति को मृत जानकर वह उस मृत शरीर पर गिरकर विलाप करने लगी। उसी समय एक साधु उसके पास आए और कहने लगे बेटी इतना विलाप मत करो। मैं इस मृत शरीर में जान डाल देता हूं। साधु ने मृत शरीर में जान डाल दी।
भावों में बहकर वृंदा ने उस शरीर का आलिंगन कर लिया। बाद में वृंदा को पता चला कि यह तो भगवान का छल-कपट है जबकि उसका पति देवताओं से युद्ध कर रहा था और वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही वह देवताओं द्वारा मारा गया।
इस बात का जब वृंदा को पता चला तो उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि, जिस प्रकार आपने छल से मुझे पति वियोग दिया है। उसी तरह आपको भी स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्युलोक में जन्म देना होगा। यह कहकर वृंदा अपने पति की अर्थी के साथ सती हो गई।
विष्णु अब अपने छल पर बड़े लज्जित हुए। माता पार्वती ने वृंदा की चिता-भस्म में आंवला, मालती व तुलसी के पौधे लगाए। भगवान विष्णु ने तुलसी को ही वृंदा का रूप समझा।
इस घटना के बाद त्रैतायुग में भगवान विष्णु ने भगवान राम के रूप में अवतार लिया और सीता के वियोग में कुछ दिनों तक रहना पड़ा।