
नईदुनिया न्यूज, महेश्वर (खरगोन) : वर्तमान में पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने को लेकर व्यापक अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं नगर के जैन धर्मशाला मार्ग पर स्थित गोबर गणेश मंदिर में सदियों पूर्व से ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश निहित है। यह मंदिर जन-जन को प्रकृति के साथ जुड़कर धार्मिक अनुष्ठान करने की प्रेरणा देता आ रहा है।
गणेशोत्सव के महापर्व पर जहां एक ओर मिट्टी, धातु और विभिन्न आकर्षक प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है, वहीं इस मंदिर में नौ सौ वर्ष पुरानी अलौकिक प्रतिमा रिद्धि-सिद्धि के स्थापित है। गाय के गोबर व मिट्टी से निर्मित यह प्रतिमा लोक आस्था, प्रकृति और धार्मिक परंपरा का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है।
भारतीय लोकजीवन में गाय के गोबर को अत्यंत पवित्र मानने की परंपरा रही है, जिसका अद्भुत आध्यात्मिक स्वरूप यहां दिखाई देता है। नगर में नर्मदा नदी, सुरम्य घाट व ऐतिहासिक किला जहां इतिहास की गाथा को दर्शाते हैं, वहीं गोबर गणेश मंदिर उस समृद्ध इतिहास के लोकजीवन से जुड़े स्वरूप को प्रदर्शित करता है।

इस मंदिर की एक और प्रमुख विशेषता भगवान श्री गणेश का दक्षिणमुखी स्वरूप है। मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार मनोकामना लेकर आने वाले भक्त मंदिर परिसर में उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु पुनः मंदिर पहुंचकर सीधा स्वस्तिक बनाते हैं। इसके अतिरिक्त भगवान को नारियल अर्पित करने को लेकर भी श्रद्धालुओं में अटूट विश्वास है।
नगर की पहचान पुण्यश्लोका देवी अहिल्याबाई होलकर की धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है। स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार महारानी अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था।
यद्यपि इसका प्रमाणित अभिलेखीय इतिहास शोध का विषय है, किंतु लोकस्मृति में यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ जीवित है। मंदिर में पूजा की सेवा पुजारी मंगेश जोशी का परिवार वर्षों से करता आ रहा है।
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